माया मैडम

June 2, 2012 Leave a comment

माया मैडम

 

मैं उसे अाश्चर्यचकित करना चाहता था, सो फ़ोन भी नहीं किया। दोपहर के दौ बजे थे – वो युनिवर्सिटी में होगी। दौ रास्ते थे, शाम तक ईन्तेज़ार कर सकता था, या नहीं। मैंने ईन्तेज़ार न करने का फ़ैसला किया अौर एयरपोर्ट से बाहर निकल कर सीधे जे.एन.यू. यानि कि जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी की टैक्सी ली। मेरी खुशी की सीमा न थी। एसा लग रहा था कि मेरी जिन्दगी का मक़सद अाखिर मुझे समझ में अा गया था। मैं कार की खिडकी से बाहर देखता जा रहा था। बारह साल किसी भी जगह से दूर रहना ही बहुत होता है यादों को विकृत करने के लिये, लेकिन दिल्ली इतनी बदल चुकी थी कि एकदम अलग शहर लग रही थी। जगह जगह पुल बने हुए थे, पुलों से नीचे झांक झांक के देखने पर जब कोई जानी पहचानी जगह नज़र अाती थी तो पता चलता था कि कहां हूं। मैंने हवा की महक लेनी चाही अौर कुछ अपनापन सा ढूंढना चाहा लेकिन सब कुछ एकदम अपरिचित लग रहा था, मानो एक दूसरी दुनिया हो। बिल्कुन नहीं लग रहा था कि इस देश में मैने अपनी करीब दौ-तिहाई ज़िन्दगी व्यतीत की थी। शायद प्रकृति मुझे अागे जो होने वाला था, उसके लिये तैय्यार कर रही थी।

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पुरानी पहचान

उस सुबह जब फ़ेसबुक में लॅागिन किया तो एक नया मैसेज अाया हुअा था, एक प्रो. माया शर्मा का, जो कि मेरे दोस्तों में से न थी अौर न ही मेरा कोई दोस्त उसके दोस्तों में था। थोडा दिमाग पे ज़ोर दिया लेकिन याद नहीं अाया के ये कौन हैं। जब मैसेज खोला तो लिखा था – “अगर ये ९९ की क्लास वाले अनिकेत हैं तो वापिस लिखना, मैं माया मैडम हूं।” पढ के याददाश्त के अाइने पर पडी धुंध एकदम साफ़ हो गयी। ये हमारे स्कूल की अन्ग्रेज़ी की मैडम थी। अपने पे शर्म भी अायी कि मैं कैसे माया मैडम को भूल गया। एक समय था कि मैं ५ साल तक लगातार उन्हीं के सपने लेता रहता था। स्कूल से निकलते ही मैं अमेरिका अा गया था अौर कभी माया मैडम से ना इ-मेल, ना फ़ोन पे कोई किसी प्रकार का कॉटैंक्ट रहा था। मुझे अमेरिका अाये हो भी १२ साल भी गये हैं। इस दौरान मेरी ज़िन्दगी इतनी बदल गयी थी कि स्कूल की कोई यादें मानो बची ही न थीं। लोग अपने बचपन के दोस्तों से पूरी ज़िन्दगी दोस्ती बनाये रहते हैं, लेकिन मुझे अपने विध्यालय के दोस्तों के नाम भी याद करने में मुश्क़िल हो रही थी। मैंने कभी उनके बारे में सोचा भी न था, कोई १२ साल से। भारत अाये हुए १२ साल हो गये थे, अब कोई वहां जाने का कारण भी नहीं रह गया था। बाकी पूरा परिवार ईंग्लैन्ड में मूव हो चुका था अौर मैं अमेरिका में अपनी कन्सल्टिन्ग कम्पनी चला रहा था। फिर मुझे माया मैडम से अपनी अाखरी मुलाक़ात याद अायी अौर ये भी याद अाया कि मैं क्यों सब कुछ भुलाये बैठा था। 

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पहला प्यार

 

जैसा कि अक्सर होता है, काफी लोगों का पहला प्यार होता है अपनी अध्य़ािपका के साथ। मेरे साथ भी कुछ ऐसा हुअा। लेिकन मेरी ये ऐकतरफा मुहब्बत साल दो साल नहीं, करीब छ: साल चली। मै अाठवीं कक्षा में था जब हमारी नयी मैँङम माया जी ने ज्ॊयन किया। उन की उम्र २२-२३ साल की होगी अौर एक दम रसभरे मम्मे, चूसने वाले अौंठ अौर अति सुन्दर चेहरा। उस समय मैं था १३-१४ साल का। हमारे स्कूल में छठी से बारहंवी तक सिर्फ लङकों वाले स्कूल में मात्र तीन चार महिला अध्य़ािपकाऐं थी, अौर वो भी ४० साल से ज्य़ादा की। जब माया मैङम स्कूल में पहली बार अायीं तो मानो भरी गर्मियों में ठंडी हवा का झोंका चल पडा हो। पीरीयङों के बीच जब भी किसी क्लासरूम के सामने से गुजरती थी, लङके खिङकियों से झांक झांक के अाहें भरने लगते थे। लूली तो खङी होती ही थी मेरी, अौर िकशोरावस्था में ज्यादा कुछ सूझता भी नहीं, पढाई का दबाव अौर लौङे का उठान, पूरी दुिनया भले ही जाये भाङ में। उपर से सिर्फ लङकों के विध्यालय के कारण यौनिक तनाव। माया जी ने एम. ए. किया हुअा था अौर वो अधिकतर अध्य़ापकों से अधिक पढी हुई थी सो वे सिर्फ़ ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षाअों को ही पढाती थी। 

 

रोज़ सुबह प्रार्थना का समय मेरे लिये दिन का सबसे अच्छा समय होता था कयुंकि उस समय माया मेम साब के दर्शन होते थे। मेरे साथ के सब लङकों को पता था कि मैं माया मैङम का कितना दीवाना था अौर वो मेरा मजाक उङाने का कोई मौका नहीं जाने देते थे। दिन-ब-दिन मेरे दिमाग में बस माया मैङम का फ़ितूर बढ़ता ही जा रहा था। हमारे पुरुष अध्यापक भी एक नम्बर के हरामी होते थे, हम तो बच्चे थे, वे हरामी हम बच्चों को तरह तरह की गन्दी कहानीयां सुनाते रहते थे, मुम्बई की रन्ङीयों से ले के अध्यापिकों की प्रेम कहानीयों तक, सब तरह के सच अौर झूठ! ऐसे ही एक दिन एक ऐसे अध्यापक ने माया जी के बारे में कुछ बताया तो मेरे कान खड़े हो गये। मास्थर हरबन्स जी बोले-बेचारी माया, शादी हो नहीं पा रही बेचारी की, क़या फायदा इतना पढ़ के। बच्चों ने थोडा अाश्चर्य जताया तो बोले, कोई नहीं, मजे तो मिल ही जाते हैं, हट्टे कट्टे लडकों को पढाती है। जब इनकी कलास लगती है तो ये आर्टस वाले लडके अन्दर से दरवाज़ा बन्द कर लेते हैं अौर उनकी कुर्सी को घेर के जी भर के मजा लेते हैं। अौर ज्यादा खुलासा करने से उन्होने मना कर दिया, ये कहके िक वो कोई अफ़वाह नहीं शुरू करना चाहते। वो तो हल्के से ये बात कह गये लेकिन मेरे दिमाग में ये बात छप गयी अौर अगले चार-पांच साल तक शायद ही कोई दिन गया हो जब मैंने इस बारे में न सोचा हो। मेरे जो इस उम्र में अपनी टीचर पे सेन्टी हुए हैं,उन्हे मेरे दिल की हालत पता होगी। मैंने दिन देखा न रात, बस माया मेम साब की क्लास के बारे में सोच सोच के इतनी मुट्ठ लगायी कि लन्ड में हर पल दर्द रहता था। मैं सोचता रहता था के क्लास में लङके क्या करते होंगे-मम्मे दबाते होगें या गाण्ड में हाथ दे देते होगें। इन्हीं सवालों में मैं अगले कई साल उलझा रहा। फिर एक दिन मैंने अपने स्कूल के बाथरूम की दीवार पे लिखा देखा – “माया की फुद्दी लाल है”! अब मेरी “imagination” की कोई हद नहीं थी। अब सोचता हूं तो हंसी अाती है, उस समय मुझे ये भी नहीं पता था कि फ़ुद्दी, यानि की चूत दिखती कैसी है। पहली बार चूत के, या यूं कहिये चूत की फ़ोटो के दर्शन मैंने अगले साल किये थे जब क्लास का एक लडका न जाने कहां से एक पेंटहाउस ले अाया था अौर पूरी क्लास को दिखा दिखा के रौब झाड रहा था। हमारे इतिहास के अध्यापक जी ने देख लिया अौर डांट डपट कर के बेचारे की मैगज़ीन, जो उसका कोई चचेरा भाई अमेरिका से ले अाया था, हडप ली। बेचारा घर या स्कूल में शिक़ायत लगाने लायक भी नहीं था। खैर, मैं यूंही बहाव में बह गया, हँा, मैं बता रहा था कि मैं माया मैडम के बारे में सोचता रहता था – शायद माया जी क्लास में बिना पेंटी के साङी पहन के अा जाती हैं अौर लङके या तो झुक झुक के उनकी टागों के बीच से उनकी चूत के दर्शन करते रहते हैं या उनकी साङी ही उठा या उतार लेते हैं। मेरा बाल मन उस समय इस बात के सिवा कुछ सोच नहीं पाता था। मेरी िज़न्दगी का सिर्फ एक उद्देश्य था-ग्यारहवीं कक्षा में अार्टस में दाखिला लेना अौर माया मैङम के मजे लेना। लेकिन हमें माया मैङम की क्ळास में बैठने के लिये ग्यारहवीं तक इतेंज़ार नहीं करना पङा।

 

हुअा यूं कि जब हम नवीं कक्षा में थे तो एक दिन हम जब अन्गरेज़ी की क्लास में अपने मास्टर का इन्तज़ार कर रहे थे तो मेरा बेन्च मेट, यानी कि वो लङका जो हमेशा मेरे साथ बेन्च पे बैठता था अौर जिसके सूखेपन के कारण हम जिसे “हङ्ङी” बुलाते थे, मुझसे बोला – “अाज तो मौजें अा गयी, माया मैङम पढाने अायेगीं।” ये बात मुझे अाज तक समझ में नहीं अायी कि हङ्ङी जैसे लोग, जो पढाई में एकदम कमज़ोर, हर मास्टर से पिटने वाले, हमेशा ऐसी खबरें कहां से पकड लाते हैं, अौर वे सच भी होती हैं।  हङ्ङी बोला – “मास्टर बीमार हो गये अौर माया मैङम उनकी जगह अायेगीं, अगले पूरे हफ्ते।” मेरी खुशी की सीमा न रही। शायद हमें भी पता चले कि ये सीनीयर क्लास वाले क्या मजे लेते हैं। 

 

अब मैं अव्वल अाने वाले लडकों में था, सो अव्वल अाने वाले लडकों की तरह सामने वाले डेस्क पे बैठता था। टीचर का डेस्क मेरे डेस्क के एकदम सामने वाला बेचं था, जो िक िवध्यार्थीयों वाले बेचं जैसा ही था, बस घुमा के क्लास की तरफ मुहं करके रखा हुअा था। अब अाप समझ ही रहे होगें के ये बात कहां जा रही है। माया मैडम क्लास में अायी, हम सब लोग खडे हुए। मैडम ने सबको बैठने के लिये कहा, बताया के हमारे मास्टर बीमार हैं इसलिये अगले पूरे हफ्‍ते वो ही हमें पढायेगीं। मुझे तो यूं था िक पूरी िज़न्दगी भी पढायें तो बस न हो। इतने नज़दीक से मैडम और भी सुन्दर लग रही थी। दिल करता था कि बस उन्हें देखे जाऊं। खैर मेरा बालमन न जाने कयूं सोच रहा था कि मैडम के अाने से लडके अन्दर से क्लास का दरवाज़ा बन्द कर लेगें अौर कुछ मैडम के चूच्चे वूच्चे दबायेगें। ऐसा कुछ न हुअा। अब सोचता हूं तो शर्म भी अाती है कि मैं न जाने किस तरह की वहशीयत में था कि एक महिला के यौन शोषण के नाम से कई साल मुट्ठ लगायी।

 

जैसा कि मैंने पहले लिखा, मैं पढाई में थोडा ठीक था। मैडम ने अगले पूरे हफ्‍ते सिर्फ़ हमें होम वर्क दिया और कक्षा में सवाल दिये, कुछ नया नहीं पढाया। मैं हमेशा जवाब देने में तत्पर रहता था, अौर वो मुझसे बहुत खुश भी थी। लेकिन बाकी कक्षा ने उन्हे ज्यादा इम्प्रेस नहीं किया। हमेशा बोलती रहती थी के विश्वास नहीं होता कि हमारे मास्टर ने हमें ये भी नहीं सिखाया। मुझे अपनी नज़रें मैडम की साडी के पीछे से झांकते ब्लाउज़ से हटानी मुश्क़िल रहती थी। हड्डी की तो रोज़ पिटाई होती थी लेकिन वो मैडम से पिटने में खुश होता ज्यादा नज़र अाता था। लेकिन हड्डी ने शरारत में एक काम ऐसा किया, जिसका मैं कई साल शुक्रगुज़ार रहा। वो मजे में बार बार मेरा पेन ले के ज़मीन पे फेकं देता। मुझे पहली बार तो समझ नहीं अाया लेकिन जब उसने पूछा कि मैडम ने नीचे क्या पहन रखा है, तब मुझे समझ में अाया िक असली मक़सद क्या है। थोडी देर में हड्डी ने फिर मेरा पेन गिरा दिया। पहली बार जब मुझे अदेंशा न था तो डर नहीं लगा था, अब झुकते डर लग रहा था कि पकडा गया तो मैडम न जाने क्या सोचेगीं अौर बेकार में पिटाई होगी या घर शिकायत होगी। मैं डरते डरते झुका अौर बेन्च के नीचे पेन टटोलते हुए मैडम की टागों की अौर देखने लगा। मैडम ने साडी पहन रखी थी अौर उनके दोनों पैर ज़मीन पे थे। मेरे देखते देखते मैडम ने अपनी एक टागं उठायी और दूसरी टागं पे रख दी। दूसरी टागं से साडी घुटने तक चढ गयी थी। 

 

देख के मेरा बुरा हाल हो गया, समय जैसे एकदम रुक गया। मैं भूल गया कि मैं झुका किसलिये था और मैडम की मक्खनी टागों को घूरने लगा। दिल किया कि इन प्यारी प्यारी टागों को अपने हाथों से हल्के हल्के सहलाऊं, अपनी जीभ से जम के चाटूं, लडं के सुपाडे को मैडम की त्वचा पे रगडूं, घुटने के पिछली तरफ़ के नर्म भाग में लन्ड बिठाऊं। मैं यूहीं इन प्यारे प्यारे ख्यालों में गुम था कि हड्डी ने मेरे कधें पे हाथ रख के हिलाया – “अबे उठ, पिटेगा क्या?” मैं होश में अाया तो सुनाई दिया के मैडम मेरा नाम बुला रही थीं। मैं हडबडा के बैठा तो मुझसे पूछा – “क्या कर रहे थे?” मैंने बताया कि पेन गिर गया था। मैडम ने एक मुस्कान के साथ कहा कि कोई बात नहीं, क्लास एक सवाल का जवाब नहीं दे पा रही, तुम जानते हो क्या? मैडम ने सवाल पूछा और मुझे जवाब तो तब अाता जब मैं सवाल समझने की हालत में होता। मैडम बोली -“तुम्हारी पहली बार है कि तुम जवाब नहीं दे पाये लेकिन तुम्हे कोई स्पेशल ट्रीटमेन्ट देना जायज नहीं होगा, सो सज़ा मिलेगी।” मेरी सज़ा ये थी कि मैं अगली थोडी देर के लिये “मुर्गा” बनूं, मैडम के पास में। मैं बेन्च से बाहर अाके मैडम की और मुहं करके मुर्गा बन गया। मैडम ने बाकी क्लास को पढाना ज़ारी रखा। मैं मुर्गा बने मैडम की टागों की और देखता रहा। मैडम ने अपना एक पांव दूसरी टागं पे चढा के रखा हुअा था अौर उन के घुटने तक की नन्गी टागों के दर्शन से मेरी अाखें गर्म हुए जा रही थी। वैसे तो मुर्गा बनना बडे शर्म की बात थी नवीं क्लास के छात्रों के लिये, लेकिन इस समय मेरे दिमाग में सिर्फ़ वासना भरी थी अौर अाखों में सिर्फ़ मैडम की टागों के नजारे। मुझे ये समझ में नहीं अा रहा था के मुझे सज़ा मिल रही है या ईनाम। जो भी हो, मुझे कोई शिकायत न थी। मैं नीचे से मैडम की टागों को यूंही घूरता रहा। सबसे ज्य़ाादा जिज्ञासा मुझे इस बात की थी कि घुटनों के उपर वाली अौर, जहां कपडों के अन्दर अन्धेरे के कारण कुछ नज़र नहीं अा रहा था, मैडम का जिस्म कैसा होगा? मैडम के घुटनों के दोनों अौर वाले गहराव में मैं जब अपनी जीभ फिराऊगां तो कया उन्हें गुदगुदी होगी। मेरे सोचते सोचते कोई ५ मिन्ट गुज़रे होंगे कि मैडम ने बोला – “बस बहुत हो गया, अब अपनी सीट पे जाके बैठ जाअो”। बडी मुश्किल से अपनी पैंट में लन्ड के तनाव को छुपाने की कोशिश करते हुए मैं अपनी सीट पे गया लेकिन मुझे अाज भी पूरा विश्वास है कि पूरी क्लास से अौर कम से कम मैडम की अांखो से पैंट के उपर उपर से मेरा खडा लंड न छुप पाया। मैडम बस मुस्कुराती रही। बचे हुऐ पीरियड में मै बस मैडम की टागों के सपने लेता रहा। पूरे हफ्‍ते ये रोज़ का खेल सा बन गया, हड्डी मेरा पेन नीचे गिराता, मैं जी भर के अांखे भर लेता, मैडम मुझसे सवाल करती, अधिकतर तो मैं बता पाता, नहीं तो मुर्गा बनके मैडम की टांगो का दीदार करता। सप्ताह कब गुज़रा, पता ही नहीं चला। उस के बाद, नवीं अौर दसवीं क्लास में मैं जब भी क्लास के बाहर माया मैडम, जो हमें अब पढाती नहीं थी, मिलती थी, मैं नमस्ते करना नहीं भूलता था। मेरी ज़िन्दगी का अगला मक़सद था ग्यारहवीं में अार्टस् में दाखिला लेना अौर माया मैडम के मजे लेना।

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एक दिलासा

मैं यहां उन सबको, जिन्होंने इतने सब्र से मेरी कहानी यहां तक पढी है, धन्यवाद अौर ये दिलासा देना चाहता हूं कि अगर अाप इस कहानी में चुदाई का इन्तज़ार कर रहे हैं, तो चुदाई होगी अौर ज़रूर होगी। एक नहीं, बहुत बार होगी। जैसे अापने सोचा, वैसे होगी अौर जैसे अापने नहीं सोचा होगा, वैसे भी होगी। ये कहानी चुदाई, जुदाई, तन्हाई, भावनाअों, एक भावना नामक लडकी अौर अौर भी ज्यादा चुदाई की कहानी है, अत: थोडा सब्र रखें।

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एक पुराना मौसम लौटा

 

मेरे दिमाग में पुरानी एक खुश्बू सी भर गयी थी, किसी व्यक्ति या जगह की नहीं, समय की। मेरे अाठवीं से बारहवीं कक्षा तक के समय की। इस खुश्बू ने मुझे एकदम तरोताजा सा कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि एक दरवाजा खुलेगा अौर मैं अपने पुराने स्कूल में प्रवेश कर लूगां। मैने इतने लम्बे समय से उस समय के बारे में सोचा नहीं था अौर अब अचानक मेरा दिल वापिस जा के एक बार अपने पुराने स्कूल में जाने को हो उठा। मेरी बेताबी की भी सीमा न थी। कोई बारह साल बाद अाज माया मैडम से मुलाक़ात होगी। मैं एयरपोर्ट के अागमन सेक्शन के बाहर फूलों का एक गुलदस्ता ले के एक घन्टे पहले ही पहुंच गया था। सोच रहा था कि पता नहीं इतने समय के बाद पहचान भी पायेंगे एक दूसरे को या नहीं। माया मैडम क्या अब भी पहले जैसी सेक्सी होगंी के नहीं। फ़ेसबूक पे उन्होंने तस्वीरें नहीं लगायी थीं, ना ही अपना वैवाहिक “status” “post” किया था। फ़ोन पे भी जब बात हुई तो मुझे पूछना थोडा अजीब लगा कि अापने शादी कर ली के नहीं। अपने बारे में तो मैंने ख़ुद ही बता दिया था लेकिन माया मैडम ने कुछ न बताया अपने बारे में। मेरी अधीरता बढती जा रही थी। इतने समय से उन्हे एकदम भुलाये बैठा था अौर अब सारी यादों की कसर एक बार में निकल रही थी। मैंने सोचा कि बेताबी का हश्र तो बुरा ही होना है। पिछली बार में अौर अाज में मुझ में भी काफ़ी परिवर्तन अा चुके होंगें, भले ही मुझे पता चले या ना चले। मेरी खूबसूर्ती की परिभाषा भी तब से अब तक बहुत बदल चुकी होगी। वैसे भी माया मैडम खाली मिलने ही तो अा रही हैं। लेकिन उतसुक्ता बढती ही गयी अौर उतसुक्ता के साथ साथ एक अौर चीज़ हुई – मेरा लन्ड़ एकदम सख्त हो गया। मैं बेंच पे बैठ गया ताकि अास पास के लोगों को न दिखे। बीच में दौ बार बाथरूम भी हो अाया लेकिन अकडन कम न हुई। 

 

अाखिर माया मैडम का जहाज अड्डे पर उतरा। बाहर अाने में अाधा घन्टा अौर लग गया, ईम्मिग्रेशन अौर कस्टम से निकलते निकलते। बाहर अाते लोगों की भीड़ में मेरी नज़रें माया मैडम को ढूढं रही थी। जब अाखिर माया मैड़म नज़र अायीं, तो उन्होंने ही मुझे पहचाना अौर दूर से हाथ हिलाया। एसा होने के मुख्य दौ कारण थे। पहला तो मुझे अपनी अाखों पे विश्वास न हुअा- मैं न जाने कयों साडी में लिपटी एक ३६-३७ वर्षीय थोडी थुलथुल सी दिखने महिला की अपेक्षा कर रहा था। माया मैड़म एकदम मॉडल की शेप में थी, एक टाईट गुलाबी टी शर्ट, जिसमें उनके टाईट मम्मे उनके कदमों के साथ उठ गिर रहे थे, अौर नीचे काली कैपरी में हर अाने जाने वाले के दिल पे छुरी चल रही होगीं। मेरे साथ दौ स्तरों पे दौ-दौ बातें हुईं – शारीरिक तौर पे मेरे लन्ड़ ने एक साथ फ़ुफ़ंकार अौर अंगड़ाई ली, अौर मानसिक तौर पे अफ़सोस हुअा इतने लम्बे समय दूर रहने का, साथ साथ खुशी भी हुई कि कम से कम अब तो मिल पा रहे हैं। मेरे दिमाग में बारह साल पहले की जो छवि थी, मैडम उससे भी ज्यादा सेक्सी दीख रही थीं। 

 

दूसरा कारण मैं माया मैड़म को नहीं पहचान पाया ये था कि मैं न जाने क्यूं ये मान के बैठा था कि मैड़म अकेली अा रही होंगी। लेकिन उन के साथ एक अप्सरा या कम से कम अप्सरा सी दिखने वाली एक बहुत ही सुन्दर लडकी, जिसकी उम्र २१-२२ साल की रही होगी, थी। इस लडकी के बाल खुले खुले, चेहरा बिल्कुल तरोताजा, चौबीस घंटे के सफ़र की थकान का नामोनिशान तक नहीं, चेहरे पर मेकअप भी एकदम दुरुस्त। मैंने सोचा उतर कर शायद सबसे पहला काम मेकअप का टच-अप ही किया था। उसने भी एक टाईट टी शर्ट, जो कि स्पोर्ट ब्रा जैसी ज्यादा थी पहन रखी थी। उसकी हरी टी शर्ट जो उसके नाजुक पतले शरीर पे मानो गलती से लग गये मोटे मम्मों को ऐसे दबा के रखे हुए थीं जैसे अड्डे पे खडे सब मर्द, जिनकी अाखों ने गल्ती से भी उसकी अौर देख लिया हो, अौर शायद कुछ अौरतें भी (अाखिर सान फ़्रासिंस्को शहर है), दबाना चाह रहे होगें। नीचे टाईट स्लैक्स, वो भी घुटनों तक। उस का रंग भी ऐसा जैसा सिर्फ़ भारतीय लडकियों का हो सकता है – गौरी भी अौर लाली से भरी हुई भी। यहां ये कहना ज़रूरी है कि दोनों इतनी सुन्दर लग रही थीं कि ये फ़ैसला करना मुश्क़िल था कि कौन ज्यादा माल है। ऐसे सज धज के अायी थीं दोनों जैसे किसी फ़ैशन-शो में जा रही हों। मैंने एक पल को सोचा कि ये “fob effect” है, यानि कि ये लोग ये सोच के अायी हैं कि अमेरिका में लोग हमेशा ऐसे ही कपडे पहन के रखते हैं। खैर, मुझे क्या, मेरी तो अाखें सिकती रहेगीं। बाहर अाते ही माया मैडम ने बहुत खुश होते हुए जोर से मेरा नाम पुकारा अौर मुझे एक जबर्दस्त जफ्फी दी यानि कि अागोश में भर लिया। मैंने भी माया मैडम को अपने अागोश में ले लिया अौर अाखें बन्द कर ली। बहुत समय बाद किसी से मिल कर अपनापन लग रहा था। माया मैडम के मम्मे मेरी छाती से सटे हुए मेरे जोरदार अागोश में दबे तकियों से महसूस हो रहे थे अौर मेरे दिल को एक सूकून सा दे रहे थे। माया मैडम ने पहले अपनी बाहें खोली अौर मुझे भी अालिगंन मुक्त होना पडा। माया मैडम से थोडी हंसी या खुशी दबायी नहीं जा रही थी लेकिन उसमें थोडा अजीबपन था, जो मुझे उस समय समझ में नहीं अाया, जो शायद अच्छा भी था। शायद मेरा खडा लन्ड माया मैडम के पेट में लगा होगा, अगर उस समय मेरा ध्यान इस बात पे चला जाता तो मैं शर्म के मारा शायद उन लोगों से बात भी न कर पाता। माया मैडम मुस्कुराते हुए बोली- “कैसे हो, अनिकेत! कितने, करीब १२ साल हो गये हैं ना?” मुझे सुन के अच्छा लगा, मैं अकेला ही नहीं था जिसने पिछली मुलाक़ात से अब तक का पूरा हिसाब लगा रखा था। मैंने हॉं में जवाब दिया अौर पूछा – “अाप कैसी हैं, माया मैडम?”

“मुझे सिर्फ़ माया बुलाअो, अनिकेत। मैं बहुत अच्छी हूं अौर अब तुम से मिल के अौर भी अच्छी हो गयी हूं।”

 

मुझे माया मैडम के सीधे सीधे कहने के अन्दाज़ से थोडा अजीब सा लगा अौर थोडी सुखद अनुभुति भी हुई। मैं कुछ जवाब देता, इससे पहले माया मैडम ने अपने साथ अायी अप्सरा से परिचय करवाया। 

“ये हैं मेरी पूर्व-स्नातक छात्रा, श्रेया, डॉक्ट्रेट कर रही है, ये भी मेरे ही प्रोजेक्ट पे काम कर रही है, ईसीलिये ये भी साथ अायी है।”

माया ने बताया तो था किसी प्रोजेक्ट के बारे में, कोई किसी स्कोलरशिप या ग्राटं से पैसा मिला है कुछ “sociology” की “research” करने के लिये। “research” थी अमेरिका के समाज के बारे में ही, कुछ महिलाअों के हक़ या ऐसे ही किसी चीज़ के बारे में। मुझे ये समझ में नहीं अाया कि इस “research” के लिये किसी को भारत से बुलाने की क्या ज़रूरत थी। लेकिन मेरी समझ में अौर भी बहुत सारी बातें नहीं अाती, इसलिये मैंने ये सोचने में ज्यादा दिमाग नहीं लगाया।

“हेल्लो, हाउ अार यू!”, श्रेया ने दिल्ली की अन्ग्रेजी के लहजे में कहा

“अाई ऐम फ़ाईन, हाउ अार यू!” 

 

मेरी झिझक लगातार बरकरार रही, लेकिन बातें फिर भी चलती रहीं। मैंने उनके सामान की ट्रॉली ली अौर उन्हे अपने साथ पार्किंग में ले गया। सामान अपनी कार में रखा। शाम के सात बजे थे। मैंने पूछा – “डिन्नर का क्या प्लान है, माया मैडम?” माया मैडम ने अनसुना कर दिया तो मैं बोला, “अ …, माया, डिन्नर का क्या प्लान है?” माया ने मुस्करा के मेरी अौर देखा – “भूख तो लगी है, प्लेन का खाना अच्छा नहीं था, मैंने तो कम ही खाया।” श्रेया को भी भूख लगी थी, तो मैंने एक अच्छे रेस्टॉरेन्ट का नाम सुझाया, जो देखने में भी बहुत अच्छा है अौर खाना भी ठीकठाक है, वो कुछ भी खाने को तैय्यार थी। 

खाना खाके वापिस उनके होटेल तक पहुचंते पहुचंते दस बज गये। मुझे हैरानी सी हुए कि ग्राटं से इतने अच्छे होटेल में रुकने के लिये कैसा बहाना पडता है। खैर, सरकार का काम, सरकार जाने। 

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लम्बी चुदाई

 

होटेल पहुंच के माया ने बोला कि उपर अा जाअो रुम में, थोडी देर बातें करते हैं, पिछले बारह सालों की कहानी सुनाते हैं। माया अौर श्रेया दोनों एक ही “सुईट” में थे। सुईट में एक पूरा बेडरूम था, जिसने दी “फ्ुल साईज़” बिस्तर थे एक बडा टी वी, एक सोफ़ा चेय़र अौर एक अटैचड बाथरुम। एक बाथरुम बाहर भी था। एक तरफ़ पूरी रहोई थी, माईक्रो-वेव अौर फ़्रिज के साथ, एक तरफ़ एक छोटा सा ऑफ़िस अौर एक बडा सा एरिया, जहां दौ सोफ़ा, एक कॉफ़ी-टेबल अौर एक अौर बडा टी वी रखा था। हम सुईट के लिविंग रुम में बैठे काफ़ी देर गप्पें लगाते रहे। मेरा वहां से उठ कर जाने का बिल्कुल भी दिल नहीं कर रहा था अौर लग रहा था कि माया अौर श्रेया को भी मेरी संगत कोई बुरी नहीं लग रही थी। अाखिर जब मैंने उठ कर जाने का अनमना सा प्रयास किया तो माया ने कहा -“चाहो तो यहीं रुक सकते हो। मैं अौर श्रेया एक बिस्तर पे सौ जायेंगे अौर तुम दूसरे पे। मेरे दिल में एकदम लड्डू फूटने लगे। अाज रात कुछ होने वाला तो है।

 

पहले बाथरुम में जाके श्रेया कपडे बदल के एक नाईटी में अायी तो माया कपडे बदलने अन्दर चली गयी। मैं अपने पूरे कपडों में बिस्तर के किनारे बैठा था। लन्द रह रह के किसी अपेक्षा में फुदक रहा था। श्रेया मेरे पास अाके खडी होके बातें करने लगी तो मुझे उनके कपडों के झीनेपन का अाभास हुअा। पीछे से अा रही रोशनी से उसने पूरे बदन की हदें कपडों के बाहर से ही साफ़ दिखाई दे रही थी। उसने सफ़ेद ब्रा अौर सफ़ेद पेंटी पहन रखी थी। मैंने सोचा कि ये रोज ब्रा पहन के सोती है या अाज मेरे कारण पहन रखी है। खैर, उस के गौल मम्मों को ब्रा के भींचने की सोच से मेरे लौडे ने एक दमदार हिचकी ली अौर मैंने जानबूझ के कोई कोशिश नहीं की ये छुपाने की। जब माया बाहर अायी तो माया ने भी एकदम वैसी ही झीनी नाईटी पहन रखी थी। उसके भी कपडों में से प्रकाश अाराम से अन्दर बाहर जा के बता रहा था कि अन्दर सफेद ब्रा अौर सफेद पेंटी पहन रखी है। मैंने सोचा कि एसा कैसे हो सकता है, ये लोग क्या साथ शॉपिंग करते हैं? दोनों गुडनाईट बोल के एक बिस्तर पे लेट गयी अौर मैं दूसरे पे। माया मेरे बिस्तर से परे वाली तरफ लेटी अौर श्रेया मेरी अौर लेट गयी। सोने से पहले श्रेया के शरारत वाले अन्दाज में कहा था- “ंमैंने सब देख लिया था।” मुझे समझ में अाने में वक़्त न लगा कि उसने मेरा खडा लन्ड देख लिया था। इसी विचार से मेरा लन्ड खडा हो गया कि श्रेया जैसी सुपर मॉडल जैसी लडकी ने मेरे खडे लन्ड पे नजर डाली, मेरी पेंट के उपर से ही सही। 

 

थोडी देर में लगा कि दोनों सो गयी। मुझे नीन्द नहीं अा रही थी। लौडा परेशान कर रहा था। मुझे समझ में नहीं अा रहा था कि अगले कुछ घन्टों में चुदाई के मौके का इन्तेज़ार करुं या लगा लूं मुठ्ठ। लडकियां बाथरुम की रोशनी जला कर सोयीं थीं, सो कमरे में हल्की हल्की रोशनी थी। मैंने अपनी पेंट का बटन खोला, चेन थोडी नीचे की अौर पेंट को ढील देके अपने कून्हों से नीच सरका दी। फिर मैंने अपना हाथ अपने कच्छे में डाल लिया अौर घूम के लडकियों की अौर मुंह करके लेट गया। माया अपनी पीठ के बल लेटी थी अौर श्रेया माया की अौर मुंह करके लेटी हुई थी। अब अमेरिका में ये थोडा अजीब लगता लोगों को, लेकिन हम हिन्दुस्तानीयों के लिये बिस्तर शेयर करना अाम बात है अौर हम इस बारे में ज्यादा सोचते भी नहीं। मैंने देखा कि श्रेया के शरीर से चादर पूरी उतर कर उसके नीचे पहुंच चुकी थी। मैं घूम के उनके बिस्तर की अौर मुंह करके लेट गय। मेरा हाथ अब भी मेरे कच्छे के अन्दर था। हल्की हल्की रोशनी में श्रेया के पीछे से उसके शरीर के चढाव उतराव देख के लन्ड प्रचण्ड हुअा जा रहा था। मैं ने लन्ड को सहलाना शुरु कर दिया। श्रेया की सांसों के साथ उसकी गाण्ड हल्के से उपर नीचे होती तो दिल में हाय हाय मच जाती थी। फिर मैंने देखा के श्रेया ने अपने एक हाथ से अपनी टांग को जरा सहलाया। मैंने फ़टाफ़ट अपना हाथ अपने लन्ड से हटाया कि कहीं श्रेया उठ न जाये अौर मुझे मुठियाते न देख ले। लेकिन उसने सिर्फ़ अपनी टांग जरा सहलायी अौर हाथ वापिस उपर कर लिया। लेकिन उसके टांग सहलाने का असर ये हुअा कि उसकी नाईटी अब उसके घुटने अौर गाण्ड के बीच तक उपर सरक चुकी थी। मेरे देखते देखते श्रेया थोडी अौर “एडजस्ट” हुई अौर अब उसकी पेंटी की सरहद के दर्शन होने लगे। मेरा दिल मेरे हलक में अा टिका। मुझे लगा कि श्रेया ये जान बूझ के कर रही है। मैंने थोडी देर अौर इन्तेज़ार किया, जिस दौरान श्रेया ने थोडा अौर अपनी टांगो को छुअा अौर अपनी नाईटी को अौर उपर चढा लिया। अब मुझे यक़ीन होने लगा कि श्रेया जान बूझ के ये कर रही है। मैंने थोडा महसूस करने की कोशिश की कि माया तो जगी नहीं हुई, कोई अावाज नहीं अायी। मैंने थोडी हिम्मत करके उचक के देखा, वो दूसरी अौर मुंह कर के सो रही थी। उसकी सांसों से पता चल रहा था कि वो बहुत गहरी नींद में सोई हुई थी। 

 

हवस में अादमी ज्यादा सोच नहीं पाता अौर बेबस हो के हालात के हाथों मजबूर हो जाता है। कई बार जो बात सपने में भी नहीं सोच सकता, कर भैठता है। मैंने किसी तरह ख़ुद को बहला लिया कि श्रेया जान बूझ के मुझ पर चक्कर डाल रही है। मैं अपने बिस्तर से उठा अौर श्रेया के पीछे जा खडा हुअा। मैंने पेंट तो उपर सरका ली थी, लेकिन बटन खुला था। मैंने श्रेया के मुंह की अौर झुक कर टोह लेने की कोशिश की लेकिन पता नहीं चला कि जाग रही है या सो रही है। मैंने हल्के से उसके कानों पर फूंक मारी, उसके मुलायम बाल थोडे हिले लेकिन वो मानो दम साध के अांखे भींचे सोई थी। मैंने थोडी हिम्मत करके उसकी नाईटी के निचले सिरे को जरा सा उठाया, श्रेया टस से मस न हुई। अब मैंने अपना होंसला अौर बढाया अौर अपना हाथ श्रेया की नंगी टांग ले उपर रख दिया। उसके गरमागरम अौर नरमानरम मांस से टकराते ही मुझे एक जोरदार कम्पन महसूस हुअा लेकिन ये समझ में नहीं अाया कि मेरे शरीर से था या श्रेया के। 

 

समय काफी देर यूंही रुका रहा। मैं हाथ रखके दम रोक के बैठा रहा अौर श्रेया भी एकदम दम साध के पडी रही। जब काफी देर तक कुछ न हुअा तो मेरा हाथ अपने अाप श्रेया की टांग पर रेंगता हुअा उपर की अौर जाने लगा। मैंने अपना हाथ थोडा उसके पीछे की अोर लगाया अौर उस के कूल्हे पर रख दिया। मेरा अपनी वासना पे काबू न था अौर मेरा हाथ अब हवस के मारे थर थर कांप रहा था लेकिन श्रेया अब भी चुपचाप लेटी हुई थी। मैं ने अपने हाथ को उसके कूल्हे पर फिराना शुरु कर दिया। थोडी देर में मेरा हाथ उसके कूल्हे के गिर्द था अौर हौले हौले दबाने लगा। मेरा अंगूठा उसके कूल्हे पर अौर अन्गुलियां उसकी  गाण्ड के बीच की दरार तक पहुंच गयी थी। गाण्ड के बीच में एकदम कोमल कोमल अनुभुति हुई अौर लौडा उठक बैठक करने लगा। मैंने श्रेया की पेंटी नीचे सरका दी अौर हाथ अन्दर डाल के श्रेया की नंगी गाण्ड को दबोच लिया। मैं कोई ५-१० मिन्ट यूंही श्रेया की गाण्ड मसलता रहा, फिर मैंने अपना हाथ थोडा अौर अन्दर डाल के अपनी बीच वाली अन्गुली से उसकी चूत की दरार को छू लिया। एकदम गरम गरम अौर गीली चूत पे मेरी अन्गुली फिसल सी गयी। श्रेया को मानो करंट सा लगा अौर एकदम उठ के बैठ गयी। मेरा हाथ एकदम बाहर अा गया अौर मैं एकदम चोर की तरह चौंक कर पीछे हो गया। मेरी पेंट मेरे घुटनों तक अा गिरी अौर मेरे बोक्सर में मेरा तना हुअा लन्ड साफ दीख रहा था। श्रेया बोली – “क्या कर रहे हो?”। मुझ से कुछ जवाब न बना, शायद थोडी गिडगिडाहट मुंह से निकली कि गलती हो गयी, मैडम को न बताना। श्रेया बोली-ठीक है, लेकिन मैं जैसे बोलूं वैसे ही करना। मुझे तुरन्त समझ नहीं अाया कि मेरी किस्मत खुलने वाली है। श्रेया थोडी माया की अौर सरकी, लेट गयी अौर मुझे अपने पास लेटने को बोला। मैं बिस्तर पे लेट गया, अब बिस्तर के एक सिरे से दूसरी अौर सोती हुई माया, श्रेया अौर मैं लेटे थे। श्रेया ने मुझे अपनी पेंट उतारने को कहा। मुझे बस ये डर लग रहा था कि माया न जाग जाये अौर रंग में भंग न पड जाये। मैंने अपनी पेंट अौर कच्छा उतार दिया, श्रेया ने मेरी टी-शर्ट भी उतार डाली। पूर्ण रुपेण अनाव्रित्त होने से लौडा हिचकियां सी भरने लगा। मैं श्रेया के साथ लेट गया। श्रेया ने मेरा लन्ड थाम लिया अौर अपने हाथ से मुट्ठियाने लगी। मैंने अाह भरी अौर अपने मन की कामना पूरी कर ही डाली अौर उसके मम्मों को कस के भींच डाला। कमसिन अौर नाजुक पतली कमर के बावजूद मौटे मौटे मम्मे मेरे हाथों में भर भी न पा रहे थे। मैं ने उसके तमाम कपडे उतार फेंके। माया के साथ सो रहे होने की सोच से लौडे की तडप अौर बढी जा रही थी। मैं अौर श्रेया दोनों एक दूसरे के चेहरे को चूमने चाटने लगे, पहले प्यार से फिर थोडे ज़ोर से। चूचे इतने मजेदार थे कि छोडने को जी नहीं चाह रहा था, अौर थे भी इतने दमदार कि मेरे जोरों से दबाने पर भी अन्दर से सख्त सख्त प्रतीत हो रहे थे। उसके निप्पल पानी भरे गुब्बारों के अगले भाग की तरह बिल्कुल नर्म नर्म थे। मैंने निप्पलों को च्यूंटी में भरा अौर अपना मुंह लगा के उसका यौवन रस चूसने लगा। श्रेया कराहें मारने लगी अौर मेरे बाल जोरों से खींचने लगी। उसे मुझसे अौर सख्ती चाहिये थी। मैंने उसे निराश नहीं किया अौर अपने होठों अौर हल्के हल्के दांतों से उसके मम्मों को हौले हौले चबाने लगा, कभी यहां कभी वहां। सबसे मजेदार था, मम्मों के निचली अौर पसलियो वाला हिस्सा। चूमने अौर चूसने में नर्म अौर उसके मस्त रसभरे गुंदाज मम्मे मेरे चेहरे पर रगडते जा रहे थे। मेरा एक हाथ उसके एक कूल्हे को जोरों से भींच रहा था। फिर मेरी बीच वाली अंगुली फिसल कर उसकी गीली चूत में जा घुसी। श्रेया अपने कूल्हे अागे पीछे करके मेरी अन्गुली को चौदने लगी। 

 

मैने मुंह उसके मम्मों से हटाया अौर उसके अधखुले होठों को चूसने लगा। मेरी जीभ उसकी जीभ से लिपटी जा रही थी। अब चौदने का वक़्त अा चुका था। मैंने श्रेया से कहा कि कंडॉम लेने बाहर जाना पडेगा, वो मुस्कुरायी अौर उसने अपने पर्स से एक कंडॉम का पैकेट निकाल के मेरे हाथ में थमा दिया। मैंने सोचा कि हिन्दुस्तान कितना बदल गया, हालांकि शिकायत कोई नहीं। मैं पैकेट फाडने लगा तो वो बोली – एक मिन्ट, अांख मारी अौर माया की अौर पलट गयी। मुझे समझ में नहीं अाया, लेकिन अब तक जो हो रहा था अच्छा ही हो रहा था। मैं ने उसके पीछे से कन्धे के उपर से मुंह निकाल के उसके चेहरे को चूमना शुरू कर दिया। मेरे हाथ अब पीछे से उसके मम्मों को दबोच रहे थे। मेरी जांघे उसकी गदरायी गांड से सटी थी अौर लन्ड उसकी टांगो के बीच से निकल कर उसकी गीली चूत से रगडे खा रहा था। मैं ये सब कर रहा था अौर मेरे सामने लेटी श्रेया अपने हाथ से माया, जो कि श्रेया की अौर मुंह करके लेटी थी, के कंधे को सहलाने लगी। मेरा माथा सा ठनका, लेकिन सोचा कि मैं तो इनके लिये नया हूं, ये तो एक दूसरे को जानती हैं, सो देखते हैं अागे क्या होता है। सोच सोच के ही लंड से अांसू से निकल कर गीला कर गये। श्रेया ने मुंह पीछे करके शरारत भरी मुस्कुराहट से अपने मुंह के सामने तर्जनी लगा कर चुप रहने का इशारा किया। मैं कौन सा शोर मचा कर रंग में भंग करने वाला था। श्रेया ने माया का गाउन सामने से खोल दिया। माया ने बहुत ही सेक्सी चमकते काले रंग की ब्रा पहन रखी थी। मैं चुपचाप श्रेया के मम्मों का दमन करते हुए चूत से लन्ड रगडता रहा। मैं थोडा उपर होके जरा ठीक से लेटा तो मेरा खडा लंड भी उपर अाके उसकी गांड की लकीर के साथ नीचे की अौर मुडे मुडे सट गया। मैंने अपनी अंगुलियां अौर भी जोरों से उसके मम्मों में गडा दी। अब श्रेया हौले हौले माया के मम्मों को उपर उपर से दबा रही थी। रात की हल्की रोशनी में काली ब्रा के अन्दर कसे माया के मम्मे दूधिया नजर अा रहे थे। मेरा दिल बैठ सा गया। एक एक पल इतना अानन्ददायी था कि मुझसे झेला भी न जा रहा था। मैंने अपने एक हाथ को श्रेया के मम्मे से हटाया अौर उसके पतले अौर नाजुक पेट पर फिराते हुए उसकी चूत तक ले गया। श्रेया ने एक बार फिर मुड कर मेरी अोर एक अौर मुस्कान रुपी जलवा फेंका। मैं अपने हाथ से उसकी चूत रगडते हुए नीचे की अौर ले गया अौर तब रुका जब मेरा हाथ चूत के दरवाजे पर दस्तक देते हुए मेरे लंड से टकराया। 

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आख़री मुहब्बत -२

October 5, 2011 Leave a comment

“मेरे बारे में क्या विचार है?”
“मैं कुछ समझी नहीं? तुम मेरी दोस्त हो, तो अच्छा ही विचार होगा.” रितिका ने कहा
“नहीं नहीं, मेरे साथ प्रेक्टिस के बारे में.”
“ओह्ह…” अब रितिका को पूरी बात समझ में आयी. लेकिन ये समझ नहीं आया के कैसे जवाब दे.
“देखो, मैं तुम्हारी दोस्त हूँ और तुम जानती हो के मुझे लड़कियों में कोई इंटेरेस्ट नहीं है, मेरा हमेशा बॉय फ्रेंड रहा है और मेरा उनसे शारीरीक सम्बन्ध भी रहा है. मैं सिर्फ तुम्हारी मदद करना चाहती हूँ. तुम्हे ठीक न लगे तो बता दो, हम कभी इस बारे में बात नहीं करेंगे. लेकिन मैं तुम्हारे और तुम्हारे बॉय-फ्रेंड के बीच में ज़िन्दगी भर का प्यार देख सकती हूँ और मैं नहीं चाहती के रिश्ते के शुरुआत में ३ महीनों की दूरी के कारण कुछ रुकावट आये. लड़के इस तरह के ही होते हैं, अगर साथ में नहीं हैं तो सब करतूतें सूझती हैं.”
रितिका सोच में पड़ गयी, न तो ना बोलते बना न हाँ.
“देखो तुम मेरा झूठा भी नहीं पीती, तो धीरे धीरे करते हैं. मेरे पास बीयर है, दोनों सहेलियां एक ही बोतल से पीते हैं, तुमसे बन पड़े तो आगे करेंगे, नहीं तो बात ख़त्म.”
रितिका कभी कभार बीयर पी लेती थी तो उसे लगा की चलो, एक बोतल से ट्राई करते हैं, उसे पूरा यकीन था के वो कर नहीं पायेगी और बात आगे बढ़ नहीं पायेगी. उसने और लोगों को देखा था एक ही बोतल से बारी बारी पीते, सो उसे लगा के कोई बड़ी बात नहीं और कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं.
भारती बीयर ले आयी, रितिका के सामने बोतल खोली और पहला घूँट रितिका को भरने दिया. रितिका ने बोतल से मुंह लगाया, घूँट लिया और कोशिश की कि बोतल के मुंह पे बिलकुल भी गीलापन न रहे. जाहिर है, के ऐसा नामुमकिन है, तो उसने अपने रुमाल से बीयर की बोतल का मुंह साफ़ करने की सोची लेकिन भारती ने उससे पहले ही बोतल रितिका के हाथ से झटक ली. फिर भारती ने बोतल से एक घूँट भरा, नेपकिन से बोतल का मुंह साफ़ किया और रितिका को वापिस बोतल पकडाई. बोली-“लो, पहले साफ़ बोतल से ट्राई करो.” रितिका को लगा कि हाँ, ठीक ही तो है, कदम कदम करके आगे बढ़ो. उसने एक घूँट और ली. भारती ने ऐसा ३-४ बार किया. बोतल अब आधी खाली हो गयी थी और रितिका को हलके से buzz होने लगी. अब भारती ने बोतल मुंह से लगाई और बिना पोंछे रितिका को बोतल पकड़ा दी. रितिका को दिल तो बहुत हुआ साफ़ करने का, लेकिन भारती उसका झूठा पहले ही पी चुकी थी, इसलिए उसे लगा के कम से कम कोशिश तो की जाए. जब वो बोतल के गीले मुंह को अपने होठों के पास लाई, उसे हल्की हल्की सी लिपस्टिक की महक आयी. वो इस महक को पहचानती थी क्यूंकि ये भारती के लिपस्टिक की महक थी. उस ने कोशिश की कि बोतल के मुंह की और न देखे, क्यूंकि गीलेपन पर नजर पड़ने पर पता नहीं वो पी पाए या नहीं. उसने जैसे ही बोतल को अपने मुंह से लगाया, हल्का सा गीलापन उसके होठों को छू गया. उसने अपने ऊपर थोडा काबू किया, मुंह खोला, हल्का सा घूँट लिया और बोतल वापिस भारती को पकड़ा दी. भारती ने उस की और ऐसे देखा जैसे वो कोई गोल्ड मेडल जीत के आयी हो. लेकिन रितिका को उस गीलेपन के होठों पे छूने से ऐसे लगा के अब तक उसके होठों पे कुछ रखा है, सो उसने अपने गीली जीभ को अपने होठों पे फेरा. उस ने बीयर की घूँट अपने हलक से नीचे उतारी ही थी कि भारती ने वापिस उसके हाथ में बीयर पकड़ा दी. कोई एक तिहाई बीयर बची थी अब उस बोतल में. भारती बोली – “एक घूँट में पी सकती हो?” भारती ने सोचा, चिंता की क्या बात है, चढ़ भी गयी तो इसी मंजिल पे उसका अपना कमरा है, नहीं तो भारती के साथ भी सो सकती है.
उसने बोतल को अपने मुंह से लगाया और गटागट एक घूँट में बची हुई बीयर पी गयी. एकदम से उसे अपने दिमाग में हल्कापन महसूस हुआ और उसे अब झूठा पीना अजीब भी नहीं लगा.
“शाबास”, भारती बोली. रितिका ने उसकी और देखा, भारती अब अपने हाथ में एक और बीयर ले के बैठी थी. रितिका ने शायद सोचा- “मैंने कभी आधी बोतल भी नहीं पी थी, आज इतनी पी ली है, लेकिन झिझक उतारने के लिए शायद पहली बार ज़रूरी भी है.” भारती ने एक घूँट पी, फिर बीयर वापिस रितिका को पकडाई रितिका ने एक घूँट और भरी. उसे हैरानी हो रही थी कि झूठा पीने पे बिलकुल अजीब नहीं लगा. बोली – “थैंक्स, भारती, पता नहीं क्यूँ पूरी ज़िन्दगी मैंने झूठा क्यूँ नहीं पीया. सब लोग मुझे थोडा अजीब से देखते थे जब मैं अकेली झूठा पीने से मना कर देती थी.” दोनों भारती के बिस्तर पे ही बैठे थे, लेकिन भारती अब रितिका के एकदम साथ आ के बैठी थी. दोनों के कूल्हों से जांघे तक सटी हुई थी. रितिका ने वापिस भारती को बोतल पकडाने की कोशिश की, लेकिन भारती ने उसकी बाजू पकड़ के अपनी गर्दन के गिर्द घुमा के सीधे उसके हाथों को पकड़ के हलके से एक घूँट ली. मूलत: रितिका की दायीं बाजू भारती के कंधे पे थी और उसी हाथ में बीयर थी, जिससे भारती ने एक घूँट भरी. रितिका ने अपनी घूँट लगाने के लिए बाजु भारती के कंधे से हटानी चाही लेकिन भारती ने उसके हाथ पकड़ पे बोला – “ऐसे ही पीयो यार” रितिका ने अपना मुंह अपने हाथ की और झुकाया और जैसे वो घूँट भर रही थी, भारती ने अपनी बाईं बांह रितिका की कमर के गिर्द लपेटी और हलके से रितिका के गाल को चूमा.
रितिका को हल्का सा झटका लगा, उसे याद आया कि वो बीयर पीने नहीं, कुछ और करने बैठे थे. उसे गालों पर किस्स बिलकुल अजीब नहीं लगी लेकिन उसे मालूम था, कि असली किस्स के लिए अभी और आगे जाना है. उसने सुना था कि किस्स करने कि टेक्नीक भी होती हैं और उसे थोड़ी ख़ुशी सी भी हुई कि वो एक एक्सपर्ट से सीखेगी, हालांकि वो किसी को इस बारे में शायद कभी बता न पाए. इस बार जब रितिका ने बोतल भारती के मुंह से लगाई, उसने भारती के गालों पर हलके से चुम्बन जड़ दिया. भारती ने घूँट भरी और रितिका की और देख कर मुस्कराई. दोनों को समझ में आ गया था कि इस के आगे बातें करने कि बजाय बाकी काम होंगे क्यूंकि बातों में दोनों को थोड़ी शर्म आयेगी, लेकिन बीयर के बहाने प्रेक्टिस पूरी हो जायेगी.
भारती ने अपने बांयें हाथ से रितिका की कमर को सहलाना शुरू किया. रितिका के लिए ये नया अनुभव था, किसी ने कभी इस तरह से उसे छुआ नहीं था. बीयर अब ख़त्म सी हो गयी थी. भारती ने रितिका के हाथ से बीयर ले कर फर्श पे रखी और रितिका की और मुडी. भारती के नर्म चूचे रितिका के चूचों पर आ दबे. रितिका को अनुभव था लड़कों और लड़कियों, दोनों से गले मिलने का, लेकिन ये कुछ और था. वो भारती को बताना नहीं चाहती थी के ये कितना सुखद अनुभव था. लेकिन भारती शायद समझ गयी थी क्यूंकि चूचों के टकराव के साथ भारती थोडा रुकी और रितिका की आँखों में आँखें डाली. रितिका को ऐसा लगा कि वो शर्म में डूब मरेगी, लेकिन उसे लगा कि प्रेक्टिस ही तो है, क्या फर्क पड़ता है. रितिका ने आँखें झपकी लेकिन भारती ने अपने हाथ से उसका चेहरा ऊपर उठाया और दोनों की आँखें फिर मिली. भारती ने अपना हाथ उसकी ठोडी से हटा के गले से सरकाते हुए रितिका के कानों के गिर्द फिराया और रितिका के सर के पीछे ले जा कर हलके से रितिका के सर को पकड़ा. रितिका को समझ में आ गया कि उसे भी ऐसा ही करना है सो उसने भी अपने हाथ से भारती के गाल को सहलाया, अपनी उँगलियों को भारती के चेहरे के गिर्द घुमाया और भारती के बालों पर फहराते हुए उसके सर के पीछे ले गयी. भारती ने उसकी और ऐसे देखा कि अभी भी कुछ कमी है, रितिका को समझ में आ गया और उसने अपने बाएं हाथ से भारती की कमर थाम ली. अब भारती आगे भी झुकी और उसने रितिका के चेहरे को अपनी और भी झुकाया. जैसे ही दोनों के होंठ नजदीक आये, भारती ने हलके से रितिका के होठों को अपने होठों से चूमा. सिर्फ एक हल्का सा स्पर्श. रितिका ने भी भारती के होठों को हल्का सा चूमा, लेकिन भारती के होंठ हलके से खुले थे, और गीले भी. भारती ने रितिका के ऊपर वाले होंठ को अपने होठों से बड़ी नरमी से चूमा. रितिका ने भी अपने होंठ थोड़े खोले. कुछ पलों के लिए दोनों के होंठ यूँ ही जड़े रहे कि भारती ने रितिका को पूरी तरह अपने आगोश में ले लिया. रितिका के मम्मे भारती के मम्मों से दब कर भिंचे जा रहे थे. रितिका को ये सब गलत भी लग रहा था और सही भी. भारती ने अपनी बाहें रितिका की कमर के गिर्द ज़ोरों से कस दी. रितिका के होंठ और खुले और भारती ने अपने मुंह को और खोला. रितिका अभी तक झूठे के बारे में सोच नहीं रही थी, लेकिन जैसे ही भारती की जीभ ने उसके होंठों को छुआ, वो थोडा पीछे को हुई. लेकिन भारती के हाथ ने उसके सर को पीछे से थाम रखा था और इससे पहले किरितिका कुछ सोच पाती, भारती की जीभ रितिका के मुंह के अन्दर थी. रितिका ने अपने आप पर बहुत जोर लगाया और अपनी जीभ से भारती की जीभ को छुआ. भारती ने अपनी जीभ और होठों से रितिका की जीभ को चूस डाला. रितिका को लगा कि इतनी बड़ी बात लग रही थी, लेकिन है नहीं. उस ने वापिस भारती की जीभ को चूसना शुरू कर दिया. कुछ पलों तक ऐसा चलता रहा. रितिका को ये सब सपने जैसा लग रहा था, और उसे शायद समय का अंदाजा भी न लग रहा हो. कितनी बार ज़िन्दगी में होता है कि एक झिझक ऐसे खुलती है कि लगता है जैसे बहुत भारी बोझ सा उठ गया हो, आज़ादी सी मिल जाती है. ऐसा कुछ मिनटों तक चला होगा और पूरी रात चलता रहता अगर उसे अगला झटका न लगता. ये झटका उसे तब लगा जब भारती के हाथ ने रितिका की कमर से हल्का सा टी-शर्ट ऊपर उठाया और अपने ठंडे हाथ से रितिका की गरम बगल पर अपना हाथ रखा. रितिका के शरीर में सिरहन सी दौड़ने लगी. भारती बोली – “देखा, मेरे छूने से इतनी प्रॉब्लम, अगर तुम्हारा बॉय-फ्रेंड छूएगा तो क्या होगा. हे भगवान्, तुम्हारा शरीर इतना संवेदनशील है. मेरा पहले बॉय-फ्रेंड मुझे इसलिए छोड़ गया था क्यूंकि मैं उस का स्पर्श सहन नहीं कर पाती थी. वो बोलता था कि मुझे छूने से मैं ऐसे करती थी मानो मेरा बलात्कार कर रहा हो. तुम्हे इस की थोडी आदत डालनी चाहिए.”बोली – “तुम बोलो तो मैं अभी रुक जाती हूँ.” रितिका कुछ न बोली तो भारती ने रितिका को चूमना और चूसना जारी रखा. अब उसका बांया हाथ सरक कर रितिका के कूल्हे को हलके से दबा रहा था और दांया हाथ रितिका के मम्मों की और जा रहा था. जब भारती ने रितिका के मम्मे को अपने हाथ से यूँ थामा के बहुत नाजुक फूल हो जो चूने से पंखुड़ी-पंखुड़ी हो जाएगा तो रितिका यूँ कांप उठी की ज़ोरों से बुखार आया हो. उसमें अब हिम्मत नहीं रही थी कि वो आँखें खुली रखे और भारती का सामना कर पाए. भारती उसके होठों और जीभ को चूसती रही और हौले हौले रितिका के मम्मे को दबाने लगी. फिर भारती ने रितिका को अपने साथ खडा किया और दोनों एक दूसरे के आगोश में एक दूसरे को चूसने लगी. रितिका ने आँखें बंद कर रखी थी और भारती ने धीरे धीरे दबाव में जोर बढाते हुए रितिका के मम्मों और कूल्हों को कस के दबाना शुरू कर दिया. रितिका कांपती भी रही और सिस्कारियां भी भरती रही. भारती ने रितिका को बताया कि अपने हाथों से उसकी कमर सहलाती रहे. ऐसा शायद १०-१५ मिनट चला होगा. आखिर भारती को लगा के एक दिन के लिए बहुत हो गया, तो बोली – “रितिका, मुझे उम्मीद नहीं थी कि एक दिन में तुम इतना आगे आ जाओगी. तुम वाकई में अपने बॉय-फ्रेंड से बहुत प्यार करती हो और मैं प्रोमिस करती हूँ कि अपने एक्सपीरिएंस से तुम्हारी जितनी होगी, मदद करूंगी.” उसने रितिका को ये भी कहा कि मौका देख के अपने बॉय-फ्रेंड (यानी मुझे) किस्स करे. बोली कि खड़े हो कर किस्स करे, मुझसे लिपटे और अगर मुझमें सेक्स की भावना आये, तो उसे पता लगेगा जब मेरा लंड उसके पेट में चुभेगा. ये भी कहा कि जब चाहे किस्स करने की प्रेक्टिस के लिए आ जाए.
इन्हें गलतियाँ कहूं तो इसका मतलब होगा कि मैं पश्चाताप मना रहा हूँ, शुक्र नहीं, लेकिन मैंने अनजाने में कुछ काम ऐसे किये कि रितिका को लगा कि वो मुझे खोने वाली है. मैंने इंग्लैंड की कंपनी में ईमेल के जरिये एक अंग्रेज लडकी से दोस्ती कर ली. वो काफी मददगार थी और मैं पहले कभी भारत से बाहर गया नहीं था, तो उसकी मदद ले रहा था, क्या साथ ले जाना है, रहने-खाने का क्या करना है, वगैरा. आगे पीछे मुझे सिर्फ चूत दिखाई देती, लेकिन दिल साफ़ होता है तो कई बार इधर उधर की बातें नहीं दिखती. वैसे ही, जब रिश्ते में असुर्खशित महसूस कर रहे हो तो हर चीज़ का बेकार में अति-विश्लेषण करने लगते हो. सो, मैं उस अँगरेज़ लडकी कि तारीफ़ करता रहता रितिका के सामने और उसे लगता रहता कि मैं जाते ही उस लडकी पे लाइन मारना शुरू कर दूंगा. मुझे इस बात का बिलकुल भी भान नहीं. और हमारी आपसी- समझ भी थी कि हम शादी से पहले कुछ नहीं करेंगे, सो जब वो मेरे नजदीक आने की कोशिश करती तो मैं समझता कि वो मेरे जाने से पहले ही मुझे मिस्स कर रही है. आखिर एक बार मौका मिला जब हम दोनों अकेले थे. वो मुझसे लिपट गयी. उसके मम्मे जब मेरी छाती से लगे तो एक साल पुरानी कहानी याद आयी, जो सदियों पुरानी लग रही थी. जब उसने मेरी कमर पर हाथों को फेरा तो भी मुझे कुछ न खटका, आखिर वो जब अपने होठों से मेरे मुंह पे चुम्बन लेने लगी तो मैंने हलके हलके ऊपर ऊपर से उसके मुंह पे चुम्बन दिए और बात ख़त्म. मैं तो अपनी समझ से अपने ऊपर काबू रखने की कोशिश कर रहा था और वो ये समझ रही थी कि मुझे उसमें रूचि नहीं रही, सो हताश और निराश हो गयी. मुझे तो ये सब बातें बाद में पता चली लेकिन उस समय मैं किसी तरह से ये नहीं जताना चाहता था कि मैं उसे चुदना चाहता हूँ. कहने की ज़रुरत नहीं कि हलके से चुम्बन के समय मेरा लंड न तो खड़ा हुआ न उस के पेट में चुभा.
इन सब बातों से रितिका इस निष्कर्ष पर पहुँची कि कुछ करना पड़ेगा. ऐसे में उनकी अनुभवी दोस्त भारती से ज्यादा और कौन काम आता, सो वो भारती के पास जा के रो दी. भारती बोली – “यार, परेशानी की बात तो है. मुझे मालूम है तुम्हारे बीच में क्या है. तुम्हारे बॉय-फ्रेंड को लगता है कि तुम एक दम “कोल्ड फिश” यानी कि सर्द लडकी हो और वो तुममें बिलकुल शारीरिक आकर्षण नहीं देखता.” गौर करने की बात ये है कि लडकी भले ही शादी से पहले (या कुछ लोगों के लिए, शादी के बाद भी) शारीरिक रिश्ता न रखना चाहे, ये उसे बिलकुल कबूल नहीं होता कि वो शारीरीक तौर पे आकर्षक न हो. ये सब सुन कर रितिका एकदम परेशान और मायूस हो उठी. बोली – “मैं क्या कर सकती हूँ, यार, तुम नहीं बताओगी तो कौन मेरी मदद करेगा. तुम पहले ही मेरी इतनी मदद कर चुकी हो.” उसे अब भी भारती के हाथों अपना यौन शोषण भारती का बलिदान लग रहा था.
भारती बोली – “तुम्हे अपनी इमेज थोडी बदलनी पड़ेगी. थोडा सा सेक्सी होना कोई बुरी बात नहीं है.” भारती ने रितिका से हेर फेर की बातें जारी रखी और अगले २-३ दिनों तक मानसिक दबाव के जरिये रितिका की सोच को सीमित कर दिया. मैं लन्दन आने की तैय्यारियों में व्यस्त था और भारती के साथ रितिका की बातें इस हद तक पहुँच चुकी थी कि वो अपने माता-पिता से भी सलाह नहीं ले सकती थी, सो रितिका भारती पर कुछ ज़रुरत से ज्यादा निर्भर हो गयी. इस के और भी हज़ारों तरीके हैं और ये तरीका शायद सबसे बचकाना और घटिया है, लेकिन भारती रितिका को २-३ दिनों तक लगातार बहलाती  फुसलाती रही. आखिर भारती ने रितिका को इस बात के लिए सहमत कर लिया कि रितिका भारती और उस के बॉय-फ्रेंड, उस रंडीबाज अशोक से रिश्तों के बारे में खुल के बात करे. उस ने न सिर्फ रितिका को इस बात के लिए तैयार किया बल्कि उसे अपना एहसानमंद भी बना दिया कि वो और अशोक किसी और के लिए ऐसा हरगिज़ न करेंगे.
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आख़री मुहब्बत – 1

October 1, 2011 Leave a comment

दोस्तों, मैंने अपने अश्लील व्यवहार से शायद ये अपेक्षा बना दी है के मैं हमेशा चोदने के इरादे से ही लड़कियों की और देखता हूँ और मुझे कभी प्यार हुआ ही नहीं. ऐसा नहीं है. बात मेरे कॉलेज के आखरी साल की है. मैं रितिका से अपने एक सांझे दोस्त के माध्यम से मिला. मैं इंजीनियरिंग कॉलेज में था, हमारे कॉलेज के पास ही उसी यूनिवर्सिटी में साइंस कॉलेज भी था. रितिका का भी आख़री साल था बी. एस. सी. का, बायलोजी में. अब आप समझ ही गए होगे के इन्जीनीयरिंग  में एकदम सूखा पड़ा रहता था लड़कियों का, और हम लोग कॉलेज से आते जाते इन लड़कियों को ताड़ते रहते थे और तरसते रहते थे के हमारी कलास में होती तो कम से कम आँखें गरम कर लेते.

मैंने रितिका को पहले कई बार देखा था, मुझे तीन साल से ऊपर हो गए थे उसी रास्ते से जाते जाते और उसे कोई ढाई साल. काफी सालों से जो लोग दोस्त प्रतीत होते थे, कुछ प्रेमी-प्रेमिका बन गए थे. शायद इस कारण के उन्हें लगता था के इसके बाद पता नहीं मिल पायेंगे के नहीं. या ये डर के कहीं कोई और उनके प्रेमियों को न उड़ा ले. खैर, सार ये के मेरे दोस्तों में से हर कोई गर्ल-फ्रेंड बनाने की धुन में था. और खाली शारीरिक ज़रूरतों के लिए ही नहीं, बल्कि शादी के इरादे से. अब ऐसे में काफी मुश्किल है इस सब से अछूत रहना. मैंने रितिका को काफी लड़कों के साथ देखा था, सो जब मैं उससे मिला और उसने बताया के उसका कभी बॉय-फ्रेंड नहीं रहा है, तो मुझे ख़ुशी भी हुई और आश्चर्य भी. लेकिन ये मानना उतना मुश्किल भी नहीं था. मेरा काफी लड़कियों से पाला पडा था, जो एकदम “कूल” लगती थी, हर तरह की बातें कर लेती थी लेकिन कभी किसी रिश्ते में नहीं पडी थी. खैर, रितिका की एक सहेली, भारती,  मेरे एक जानकार की गर्ल-फ्रेंड थी. और मेरा ये जानकार, अशोक, एक नम्बर का हरामी था. उस ने भारती को ज़बरदस्त तरह तरह से चौदा भी और सोते में उसकी नंगी तसवीरें उतार के हमे दीखाई भी. यहाँ तक कि, मौका देख के भारती की २ साल छोटी बहन को भी बहला फुसा के अपना लंड चूसा दिया, बिना भारती को भनक लगे. ऊपर से एक नंबर का रंडी बाज, सो उसे वैसे भी परवा नहीं थी के भारती उसके साथ रहे या न रहे. हम लोग उससे थोड़े दूर ही रहते थे.
रितिका से पता चला के उसे भी अशोक कोई ज्यादा पसंद नहीं है. उसने कभी ये नहीं बताया के अशोक ने उसके साथ भी चालबाजी करने की कोशिश की के नहीं, लेकिन रितिका जैसी माल और कूल लडकी के पीछे वो न पड़ा हो, असंभव है.  रितिका उस प्रकार की लडकी थी के उससे पहली बार बात करो तो लगता था के पता नहीं कब से जानते हो. मेरी उम्र कोई २१ की रही होगी और २-३ बार मैं अच्छे अच्छे काण्ड कर चुका था. रितिका तब २० साल की थी और मासूमियत और स्मार्ट नेस का अच्छा मिश्रण थी. ज्यादा नहीं, कोई ५’४”-५’५” रही होगी, ज्यादा जिम वगैरा तो नहीं जाती थी, लेकिन उसकी कुदरती अच्छी फिगर थी. कैसे भी कपडे पहनती, एकदम खिल जाती थी. मैं भी उस वक्त उसपे कुछ ज्यादा ही सेंटी था, तो शायद मेरा वर्णन थोडा अति हो रहा हो, लेकिन वो वाकई में बहुत खूबसूरत थी.
एक बात, जो मुझे शुरू में बिलकुल नहीं खटकी, ये थी के वो अपने माता-पिता के कुछ ज्यादा ही करीब थी. अधिकतर लड़कियां होती हैं, लेकिन जब हॉस्टल में रहते हुए भी माता-पिता को सब दोस्तों के, सब टीचरों के, सब दोस्तों के बॉय फ्रेंड, गर्ल फ्रेंड्स के नाम पता हों तो कुछ ज्यादा ही है. मैं उसके साथ एक फिल्म देखने पहली बार गया तो वो भी अपनी माँ को बता दिया. मुझे लगा के अच्छी बात है, मैं उसके परिवार के करीब हूँगा और बात आगे बढ़ती रहेगी. और ऐसा होता भी, अगर भारती ने रितिका को एक सुझाव न दिया होता.
हुआ यूँ के मेरी इंग्लैंड में एक कंपनी में ३ महीने की इन्टर्नशिप लग गयी. मैं बहुत खुश, रितिका बहुत खुश और मुझे पता चला के उसके माता-पिता भी बहुत खुश. हैरानी इस बात की थी के रितिका के किसी भी दोस्त, भले ही कितने दूर का हो, के साथ कुछ हो, उसके माता पिता की हमेशा कोई राय होती थी. अब मैं सोचता हूँ तो लगता है के अच्छा हुआ के मेरी रितिका से शादी नहीं हुई क्यूंकि ज़िंदगी भर झेलना मुश्किल हो जाता. खैर, इन्टर्नशिप का मतलब ये था कि मैं रितिका से ३ महीने के लिए दूर रहूँगा. ये बड़ी बात नहीं थी क्यूंकि मैं हर रोज़ उसको फ़ोन तो करता ही और हर हफ्ते हम लोग विडियो-चैट भी करते. हमारा कोई शारीरिक रिश्ता था नहीं क्यूंकि रितिका के माता-पिता की सोच थी कि शादी से पहले सेक्स नहीं और रितिका का भी यही मानना था. अगर आप लोग कभी किसी के प्यार में पड़े हो, तो आप को समझ में आ ही जाएगा कि मेरे दिमाग में भी कभी शादी से पहले रितिका के साथ सेक्स का ख्याल नहीं आया. लेकिन तकदीर को कुछ और ही मंजूर था और भारती ने रितिका के दिमाग में कुछ बात ड़ाल दी. मुझे ये सब काफी बाद में थोडा अजीबो गरीब तरीके से पता चला, लेकिन जो हुआ, उसका विवरण ये है:
भारती ने रितिका को बताया के भारतीय लड़के जब फोरेन जाते हैं, तो पूरे टाइम गोरी लड़कियों की लेने के चक्कर में लगे रहते हैं. इस बात में सच भी है लेकिन मैं उस समय थोडा अलग था. भारती ने रितिका से पूछा कि हम लोगों ने आपस में क्या किया है और वो बड़ी हैरान हुई जब उसे पता चला के हम लोगों ने कभी किस्स भी नहीं किया. उस ने रितिका से पूछा – “तुम लोगों ने अब तक किस्स भी नहीं किया तो कैसे बॉय-फ्रेंड गर्ल-फ्रेंड बोलते हो एक दूसरे को?” तो रितिका बोली – “लेकिन मम्मी मना करती हैं शादी से पहले कुछ करने से और मैं भी शादी से पहले अपनी वर्जिनिटी नहीं खोना चाहती.” भारती ने जवाब दिया – “बिना वर्जिनिटी खोये भी बहुत कुछ किया जा सकता है, लेकिन सोचो, तुमने कभी उसको किस्स भी नहीं किया और हर किसी को अपनी पहली किस्स पूरी ज़िंदगी याद रहती है, सोचो अगर इंग्लैंड में इसे कोई मिल गयी और दूसरे देश में कोई देखने वाला भी नहीं, तो तुम्हे तुरंत भूल जाएगा. ना भी भूले तो तीन महीने दूर रहने वाले हो, कोई अच्छी याददाश्त तो देनी चाहिए.” बात में थोडा दम था, लेकिन भारती जाने न जाने, रितिका नहीं जानती थी के मैं खेला-खाया हुआ इंसान हूँ. मेरे बिना शारीरिक नजदीकियों वाले नए नए प्यार के बारे में तो यूँ समझिये कि नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली.

रितिका बोली – “अच्छी याददाश्त तो मैं भी देना चाहती हूँ, लेकिन मुझे तुम्हारा सुझाव चाहिए कि क्या करून और कैसे. मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी किसी को किस्स भी नहीं किया.” भारती बोली -“ओह, फिर तो तुम्हे थोड़ी प्रेक्टिस करनी पड़ेगी.” रितिका बोली- “प्रेक्टिस, किस्स के लिए दौ लोग चाहिए. प्रेक्टिस और फ़ाइनल एक साथ ही होंगे.” भारती ने सीधे जवाब नहीं दिया लेकिन बोली – “तुम्हे किस्स के साथ और भी थोडा कुछ करना चाहिए. मैं बताती हूँ कहाँ तक जाना और कहाँ रुकना. आगे तुम्हारी मर्जी, लेकिन तुम जानती हो अशोक मेरा तीसरा बॉय-फ्रेंड है. मैं भी तुम्हारे जैसी थी, मेरे पिछले दोनों बॉय-फ्रेंड्स खोने के बाद समझ में आया के बॉय फ्रेंड को कैसे अपने साथ रखना है. मैं खाली अपना अनुभव बताना चाहती हूँ, तुम्हे ठीक न लगे तो न करना.”
“नहीं नहीं, बताओ ना.”, रितिका बोली.
“फिर पहली बात ये के थोड़ी किस्स की प्रेक्टिस करो, नहीं तो जब मुंह से मुंह लगेगा और अन्दर से गीला गीला लगेगा, तो घिन आयेगी. थोड़ी प्रेक्टिस से आदत सी पद जायेगी.”
“क्या बात कर रही हो, मैं किसी और लड़के से किस्स करने की प्रेक्टिस करूँ?” रितिका ने परेशान हो के कहा.
“नहीं, लेकिन मैं जानती हूँ कि तुम किसी का झूठा भी नहीं खाती और एक गिलास से पीती भी नहीं, तुम्हारे लिए पहली बार किस्स करना मुश्किल होगा और मुझे डर है के कहीं तुम उल्टी ना कर दो”. भारती ने तर्क बनाया.
“सच बोलूँ तो मुझे भी यही डर है, लेकिन मैं क्या कर सकती हूँ?”, रितिका बोली.
“ओ के, तुम जानती हो के मुझे इस बारे में काफी अनुभव है, तो मेरी राय मानोगी?”
“हाँ, बोलो, है कोई रास्ता कि मैं थोड़ी प्रेक्टिस भी करूँ और किसी लड़के को भी किस्स न करना पड़े. मैं चाहती हूँ कि मेरा बॉय-फ्रेंड ही पहला लड़का हो जिसे मैं किस्स करूँ.”
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लौह पथ गामिनी में मस्त मैथुन – 3: : गांड से जबरदस्ती

March 23, 2011 1 comment

पिछले अंक में मेरी कहानी थोड़ी अधूरी छोट गयी थी, और टोइलेट में शालू की चुदाई के साथ ख़त्म हुई थी. इस अफ़सोस के साथ की सिर्फ एक लडकी की चुदाई कर पाया. सो, चोदन के बाद हम लोगों ने सोचा के थोडा थोडा करके दरवाजा खोलें और अगर बाहर कोई न हो तो एक एक करके बाहर निकल लें. आगे थी रुपिका, उसने दरवाजा हलके से खोला तो दरवाजा जोर से पूरा खुल गया. सामने कोच को देख के हम तीनों चौंक गए. कोच ने मुझे एक झापड़ लगाया और थोड़ी ऊँची आवाज में बात करने लगा. मैं घबरा गया के लोग इकठ्ठे हो जायेंगे और जम के पिटाई होगी. लेकिन कोच ने अपना ध्यान शालू पर केन्द्रित कर लिया. बोले- “तुम उम्र में सबसे बड़ी और टीम की सबसे पुरानी खिलाडी हो, तुम भी ऐसा करोगी. साथ में नयी लडकी को भी खराब कर रही हो. मैं तुम्हे टीम से भी निकालूँगा और स्कूल से भी.” शालू गिडगिडाने लगी. बोली- “सर, गलती हो गयी, बोलिए क्या करू?” कोच बोला- “गलती की सजा तो मिलेगी, यहीं ख़त्म कर सकते हैं नहीं तो बाद में.” मैं समझा नहीं लेकिन शालू समझ गयी, बोली- “जैसे आप करें, सर.” कोच बोला- “ठीक है, तो फिर वापिस अन्दर चलो.” शालू वापिस बाथरूम में, कोच के साथ और मैं और रुपिका बाहर रह गए. हमें समझ में नहीं आया के क्या करें. यकीन करो दोस्तों, अब का समय होता तो मैं शोर मचा के लोगों को इकठ्ठा करके कोच की करतूत खोल देता, लेकिन उस समय मैं खुद ही डरा हुआ था और जैसे भी हो, मुसीबत से पिंड छुटाना चाहता था.

आगे की कहानी खुद शालू के मुंह से सुनी हुई कहानी है:
अन्दर पहुँच के कोच ने अपने हाथ में शालू का मुंह ऐसे पकड़ा के अंगूठा एक गाल को दबोच रहा था तो अंगुलियाँ दुसरे गाल को. बीच में उसके गोल गोल ओंठ मानो चुम्बन के लिए बाहर निकले हों. कोच ने उसके होंठों को चूसना शुरू कर दिया. फिर उसने शालू की चूची पे ज़ोरदार च्यूंटी मारी. शालू कराह उठी. कोच बोला -“क्यूँ, अजनबियों से चुदने में दर्द नहीं होता, हमी से दर्द होता है?” फिर कोच बोला- “लंड चूसेगी मेरा?” शालू बोली- “नहीं सर, जो करना है कर लीजिये” तो बोला- “लंड तो चूसना पड़ेगा, लंड चूसे बिना तो बात नहीं बनेगी. कितने दिनों से तेरे रसीले होठों पे लंड रगड़ने का ख्वाब लिए मुठ मार रहा हूँ मैं, आज तो मुंह में ले ही ले.” बोल के कोच ने अपना ढीला लंड अपनी पेंट से बाहर निकाला. शालू को थोड़ी हंसी आ गयी, तो कोच बोला, “चूस तो बिटिया रानी, फिर देख कितना बड़ा होता है. गांड फट जायेगी तेरी मेरा खडा लंड देख के.” शालू को उसके अश्लील शब्द इस्तेमाल करने पे गुस्सा तो आया, लेकिन बेचारी मजबूर थी. उसे घिन भी आ रही थी कोच के लौड़े से टपकती लार से, जिसने उसके गालों को गन्दा कर दिया था. अभी भी कोच का लंड एकदम ढीला था, लेकिन लम्बाई और गोलाई में थोडा बढ़ गया था. फिर उसने अपना लंड ले जाके शालू के होठों पे रगड़ना शुरू कर दिया. अपनी गंदी नज़रों से शाल के चेहरे पे लगातार नज़र रखे वो अपना लंड शालू के सख्त और बंद होठों से रगड़ता रहा. फिर बोला – “होंठ खोल भी जालिम, मुंह में ले ले”. शालू ने मुंह ज़रा सा खोला और उसके नाजुक नाजुक नर्म नर्म भरे भरे होठों पे कोच ने अपने लंड की उपरी त्वचा हटा के सुपाडा उसके मुंह में हल्का सा दे दिया. शालू को उसके लंड से बदबू सी आयी और ऊपर से लौड़े की लार का खट्टा खट्टा नमकीन सा स्वाद. उसके मुंह से उल्टी सी निकली, लेकिन उसका मुंह जरा और खुलते ही कोच ने उसके मुंह में अपना नर्म लौड़ा घुसेड़ने की कोशिश की. नाकाम होने पे कोच ने अपना हाथ शालू की ठोडी के नीचे रखा और दुसरे हाथ से उसका माथा थोडा पीछे धकेला. शालू का मुंह और खुला, कोई और चारा न देख के शालू ने पूरा लंड अपने मुंह में ले लिया और धीरे धीरे चूसने लगी. कोच ने अपनी आँखें यूँ बंद कर ली के अभी माल निकाल देगा, लेकिन वीर्य स्खलन के बजाय उसका लंड बड़ा और खड़ा होने लगा. अब लंड कोई ७-८ इंच लम्बा हो गया था और सिर्फ सामने के २ इंच शालू के मुंह में आ पा रहे थे. शालू ने अपने एक कोमल हाथ से कोच का लंड थामा और अपने मुंह को आगे पीछे कर के पंड चूसने लगी. लौड़ा और सख्त होता गया. कोच ने गंदी बातें जारी रखी – “बहन की लौड़ी, कहाँ थी इतने दिनों से, इतना मस्त तो रंडियां भी नहीं चूसती. चूस, और स्वाद ले ले के चूस.” गुस्से और शर्म से शालू का मुंह एकदम लाल हो रहा था, जिससे कोच को शायद और उत्तेजना मिल रही थी. झुक के कोच ने शालू का एक मम्मा पकड़ लिया और जोर जोर से दबाने लगा. शालू के निप्पल एकदम सख्त हो गए तो कोच ने कपड़ों के ऊपर से ही भांप के जोर से च्यूंटी भर दी. शालू ने हल्का सा कोच के लंड पे दांतों पे काट दिया लेकिन कोच को दर्द के बजाय उल्टा मजा आया, बोला- “हाँ, काट मेरे लौड़े पे कुतिया की तरह. उफ़, तेरे जैसी लौंडिया को तो मैं हर छेद में दिन रात चोदूं.”

शालू ने और हलके हलके कोच के लंड पे दाँतों से २-३ बार काटा, इस उम्मीद से के कोच का वीर्य स्खलन होगा और उसे ज्यादा झेलना नहीं पड़ेगा. कोच एक्टिंग तो ऐसे कर रहा था के अब निकला अब निकला, लेकिन उसका लंड उलटे और तना जा रहा था. फिर उसने शालू के मुंह से लंड बाहर निकला. शालू खड़ी होने लगी तो वो बोला- “नहीं, वैसे ही बैठी रह, सज़ा का वक़्त आ गया है.” बोल के उसने अपने लंड से शालू के गालों पे हल्की हल्की चपत सी लगानी शुरू कर दी. फिर शालू से कहा जीभ बाहर निकाल. शालू ने जीभ बाहर निकाली तो अपना लंड उसकी जीभ पे रख के ऊपर उठाया और फिर धडाक से वापिस जीभ पे थप्पड़ सा लगाया, जैसे से लंड झाड रहा हो लेकिन ये सिर्फ आगे की तैय्यारी थी.

अब कोच ने शालू को खड़ा किया और उसकी पेंट और पेंटी नीचे सरका दी, ब्रा और टॉप ऊपर सरका दी और दूसरी और घुमा दिया. पीछे से वो शालू के कान और कंधे पे दांत गडाने लगा और अपने हाथों से शालू के मम्मों पे चिकोटियां काटने लगा. शालू बोली- “सर. धीरे धीरे, पलीज, दर्द हो रहा है.” तो कोच बोला- “क्यूँ, मैंने कहा था, के चुदवाती फिर. अब अंजाम भुगत” कह के और जोर से शालू की चूचियां मसल डाली. फिर दूसरा हाथ सरका के शालू के नाजुक नाजुक पेट पे चूंटी काटने लगा. शालू का बुरा हाल था. कोच में पीछे से अपना लंड शालू की गद्देदार गंद के एकदम बीच में लगा रखा था. फिर वो बीच की लकीर पे लंड लिटाये लिटाये धक्के से मारने लगा. फिर उसने शालू के मुंह में अपनी अंगुलियाँ दे के कहा- गीला कर, जानेमन. शालू ने उसकी अँगुलियों को थोडा चूसा और फिर गीला सा कर दिया. कोच ने गीली अँगुलियों से अपने लंड पे रगड़ के लौड़े को थोडा गीला किया, फिर अंगुलियाँ वापिस शालू के मुंह में डाल के फिर गीला करवाई और फिर लंड पे लगाई. फिर कोच ने पूछा- “चुदवाई थी उससे?” शालू की ख़ामोशी में हाँ का जवाब था. फिर वो बोला, कोई बात नहीं. और अपनी उँगलियाँ फिर शालू के मुंह में डाल के गीली की और शालू की गांड पे रगड़ने लगा. जैसे ही शालू को अंदेशा हुआ कोच के इरादों का वो एकदम परे हटने लगी, बोली- नहीं, नहीं, पीछे से नहीं. कोच बोला – “तो तेरी पहले ही चुदी हुई चूत में फिर डालूँ? क्या समझ रखा है मुझे?” कह के कोच ने शालू को मजबूर सा कर दिया. बोला के आराम आराम से करेगा. फिर कोच ने अपनी गंदी उँगलियों को शालू के मुंह में गीली करके शालू की गांड में पहले एक उंगली डाली, फिर दोनों. फिर उंगलियाँ बाहर निकाल के उसने अपना सख्त लौड़ा शालू की गांड से लगाया और अपने हाथों से पकड़ के थोडा थोडा घुसाने लगा. शालू कराहने लगी, बोली- सर, दर्द हो रहा है, पलीज, मत करो. लेकिन उस वहशी का और लंड खडा होने लगा शालू की हायकार सुन कर. उसने अपने हाथ से शालू का एक कूल्हा एक तरफ को दबाया और दुसरे हाथ से लंड को पकड़ के और थोडा अन्दर घुसाने की कोशिश की, लेकिन मुश्किल से आधा सुपाड़ा ही अन्दर जा पाया. फिर कोच ने लंड निकला और झुक के शालू की गांड पे थूका. फिर लंड को इस थूक में गीला करके फिर से शालू की गांड में घुसाने का प्रयतन किया. इस बार सुपदा पूरा अन्दर घुस गया और गांड के पहले द्वार में प्रवेश कर गया. शालू दर्द के चलते अचानक से फुदक उठी, लेकिन कोच ने उसके उछलने से मिलता हुआ जोरदार झटका ऐसा दिया के लंड पूरा अन्दर घुस गया. दर्द के मारे शालू की आँखों से आंसूं निकल आये. कोच ने वहशी दरिंदों की तरह शालू के कूल्हे और मम्मे नोचने शुरू कर दिए और जोर जोर से गांड में धक्के लगाने शुरू कर दिए. उसके बुजुर्ग और खुरदरे बाल जब शालू के कूल्हों से टकराते तो शालू को खराश सी मच जाती. बाहर हम खड़े खड़े इंतज़ार कर रहे थे लेकिन थोड़ी देर में दरवाजे पे धक्कों की आवाज सुन के समझ में आ गया के अन्दर चुदाई चल रही है.

कोच का लम्बा और मोटा लंड शालू की गांड की तहस नहस करने में लगा था और उसके हाथ कभी शालू की गांड पे जोर से चपत लगाते, कभी भींच देते. शालू बोली- “सर, हुआ क्या, कसम से दर्द हो रहा है” तो कोच बोला- “बोल, मैं रंडी हूँ, मेरी गांड मारो.” थोडा जोर देने के बाद शालू को जब कोई चारा नज़र न आया तो उसने भी साथ देने का फैसला कर लिया, बोली- “मैं रंडी हूँ, मेरी गांड मारिये, सर, और ज़ोरों से.” कोच को और चढ़ गयी और उसने शालू को और नीचे झुका के और जोरों से धक्के लगाने शुरू कर दिए. बोला – “गंदी बातें करती रह बहन की लौड़ी नहीं तो पूरी रात ऐसे ही गांड चौद्ता रहूँगा और माल नहीं निकलेगा.” शालू घबरा गयी और हाँफते हाँफते बोलने लगी- “हाँ, हाँ, सर, और जोर से धक्का लगाइए, मेरे चूचे दबाइए, उफ़, कितना मजा आ रहा है, है रोज़ सुबह आपका खड़ा लंड चूसूं. मेरी गांड, चूत और मुंह, सबमें डालिए. लंड मेरे चूचों से रगड़िये चाहे गांड से.” कोच हैरान हो गया के ऐसी ऐसी बातें ये कहाँ से सीखी लेकिन गांड मारता रहा. फिर उसने शालू के बाल पकड़ के सर पीछे खींचा और उसके होठों को चूसने लगा. शालू को गांड में दर्द के साथ साथ गर्माइश महसूस हुई. कोच का काम तमाम हो चूका था. कोच फिर भी हलके हलके धक्के लगता रहा और एक हाथ से बाल खींच के दुसरे हाथ से शालू की चूची दबा रहा था. फिर उसने लंड बाहर निकाला और शालू की गांड पे झाड़ा, फिर बोला- चूस. शालू बोली- “लेकिन सर, गन्दा हो गया है, मेरे पीछे से निकला है” कोच बोला- “हाँ, तूने गन्दा किया है, तू ही साफ़ कर.” कहके कोच ने शालू को मजबूर किया लंड चूसने पे, बोला- हलके हलके चूस, चुदाई के बाद बहुत संवेदनशील हो जाता है. कह के वो शालू को थोड़ी देर लंड चूसाता रहा. फिर बोला – “अब मेरी मुट्ठ मार.” शालू ने अपने हाथों से कोच के बैठे लंड पे मुट्ठ लगानी शुरू कर दी. थोड़ी देर में लंड अध्-खड़ा हो गया लेकिन पहले की तरह विराट नहीं. कोच आँखें बंद करके शालू से चुम्बन में लगा रहा और हाथों से शालू की गांड और मम्मों से खिलवाड़ करता रहा. शालू इंतज़ार करती रही कोच के लंड का खड़ा होने का, ये सोच के के फिर से चुदेगी. लेकिन वो उस समय बहुत खुश हुई जब कोच के लंड ने हौले हौले थोडा सा माल शालू के हाथ पे उगल दिया. उसकी गांड भी चिप-चिप कर रही थी, और अब हाथ भी. कोच बोला- “अब बचा खुचा भी चूस, लेकिन एकदम आहिस्ता आहिस्ता.” आखिर यातना का अंत देख के शालू फटाफट तैयार हो गयी और कोच का लंड ऐसे चूसा के कोच खुशी और आनंद से झूम उठा. सब ख़त्म होने के बाद बोला- “शाबाश, तुम वाकई मेरी टीम की कैप्टेन बनाने लायक हो. तुमने काफी इनाम के लायक काम किया है.” फिर शालू पानी से अपनी गांड साफ़ करने लगी तो कोच अपनी वैवाहिक जीवन के दुखड़े रोने लगा. अब शालू को उस पे तरस सा आने लगा, लेकिन उस ने फिर भी बदला लेने का मन बना रखा था. बदले में कुछ एक साल लग गए लेकिन उसने बदला लिया ज़रूर. उसकी कहानी भी आपको सुनाऊंगा, लेकिन फिर कभी.

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March 21, 2011 Leave a comment

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लौहपथगामिनी में मस्त मैथुन – 2: शौचालय में सम्भोग

March 20, 2011 Leave a comment

मैं अब धीरे धीरे अपना हाथ उसके बगलों में ले जाके नर्म नर्म शेव की हुई काखें सहलाने लगा. दूसरी ओर से उसका चूच हलके हलके मेरे हाथ से टकरा रहा था. गाडी के हलके हलके धक्कों से हिल हिल के लंड भी खड़ा हुआ जा रहा था. थोड़ी और देर ऐसे ही चलता रहा. लगभग सब लोग सो चुके थे. मैंने मौका देख के कहा के मैं दरवाजे की तरफ जाके थोड़ी हवा खाने जा रहा हूँ. सोचा वो भी चलेगी तो मैं अगला दांव खेलूंगा. शालू भी तैयार हो गयी मेरे साथ चलने में, बहाना ये बनाया के यहाँ जोर से बात नहीं कर सकते क्यूंकि लोग सो रहे हैं. मैंने सोचा के बन गयी बात, तो दोनों एक एक करके डब्बे के सिरे पे बाथरूम के पास दरवाजे के पास जाके खड़े हो गए. दरवाजा खुला था तो ज़ोरों से हवा आ रही थी. शालू खड़े खड़े हलके हलके मुस्कराते हुए देखने लगी. मैंने देखा के आस पास कोई नहीं है तो बोलने की कोशिश की, लेकिन कुछ बोल न पाया. बस आगे बढ़ के एकदम साथ जाके खड़ा हो गया. मेरा लंड उसके पेट से छू रहा था. उसका चेहरा मेरी और थोडा झुका और आँखें हलके से बंद हुई तो मैंने झुक के उसके होठों को चूम लिया. थोड़ी देर मैं उसके होठों पर हलके हलके चुम्बन जड़ता रहा फिर उसने हलके से होंठ खोले तो मैंने भी अपने होठ खोल के उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया. फिर मैंने जीभ से उसके कोमल होंठो के बीच में जगह बनायी और जीभ अन्दर दाल के उसकी जीभ से मिला दी. उसने भी अपनी जीभ से मेरी जीभ को सहयोग देना शुरू किया. थोड़ी देर हम ऐसे ही जीभें लड़ाते रहे और मेरा हाथ उसकी कमर के गिर्द घिर गया. मैंने अपना बाजू उसकी कमर के गिर्द लपेट के अपने आगोश में कस लिया. उसके ठोस मम्मे मेरी छाती से लगे लगे जब दब रहे थे तो नीचे लौदा दहाड़ें मारने लगा और शालू के पेट में चुभने लगा. मैंने अपने लंड को और थोडा जोर से उसके पेट से सटाया. गाडी चली जा रही थी और हमारे बदन गाडी के झटकों के साथ डोले जा रहे थे. मेरा हाथ अब नीचे जाके उसकी गांड दबा रहा था. मैंने दूसरा हाथ भी पीछे डाल के उसके दोनों कूल्हों को जोर से भींच दिया. फिर मैंने उसकी ठुड्डी चूसनी शुरू कर दी, और बीच बीच में गालों पे पप्पियाँ लेने और चूमने चाटने लगा. मैं इतनी खुली हुई लडकी से कभी नहीं मिला था, तो हैरान भी था और उत्तेजित भी. मैंने उसकी गांड भींचते भींचते उसके गले पे हलके से होठों से काटा फिर झुक के उसकी तनी हुई चूचियों को ट्रैक सूट के ऊपर ऊपर से चूसने का प्रयत्न किया. उसके कूल्हे एकदम भरे भरे और गदराये हुए थे मेरे उसकी गांड पे हाथ रखते ही उसके मांसल कूल्हे मेरे हाथों में समा जाएँ, ऐसे भरे भरे.  मैंने अपना हाथ उसके कूल्हों के नीचे सरकाया और कूल्हों के एकदम बीच में ले आया. फिर मैंने दोनों तरफ से गांड को जोर से दबाया. इस दौरान मैं बदहवास सा चुम्मा चाटी में लगा था. अचानक लगा के कोई साथ में है घूम के देखा तो रुपिका खडी थी. शालू बोली- चिंता न करो, ये देखती रहेगी के कोई आ न जाए. मैंने रुपिका को आँख मारी, उसने भी जवाब में आँख मारी और मैं शालू के शरीर से खेलने में लग गया. अब मैंने अपने हाथ से ऊपर ऊपर से शालू की चूची थाम ली और पूरी ताक़त लगा के दबा दी. वो कराह सी उठी. ऐसे २-४ मिनट चला होगा के शालू बोली – यही सब करते रहोगे के और आगे भी कुछ इरादा है. मैं समझा नहीं तो बोली- आगे भी कुछ करना है तो बाथरूम में चलते हैं. अब जाके मेरे दिमाग में चमक आयी के ये लडकी मेरे से भी चालू है और इसे ट्रेन में चुदवाने का अनुभव है. मैंने उसे साथ में लिए लिए बाथरूम का दरवाजा खोला और दोनों अन्दर चले गए. मैं दरवाजा बंद करता के रुपिका बोली, मैं भी आ जाऊं- सिर्फ देखने के लिए. मैं थोडा झिझका हुआ था, लेकिन न हाँ कर पाया और न ना.

नतीजा ये के रुपिका भी बाथरूम में मेरे साथ. बाथरूम कोई गन्दा तो नहीं था, लेकिन जंग की बू हमेशा रहती है. बीच में खंडास और दोनों तरफ हत्थे थे. हम तीनों बड़े टाईट फिट आ रहे थे. मैंने शालू की टॉप ऊपर सरका दी और उसकी ब्रा भी बिना खोले ऊपर सरका दी. बाथरूम की रोशनी में उसके दोनों मम्मे चाँद की तरह चमक रहे थे और उसके भूरे भूरे निप्पल लाल अंगूर की भांति जैसे चूचों पे चिपके हों. मैंने अपने ओंठ उसके निप्पल पे चिपका दिए और उसका यौवन रस गट गट पीने लगा. पहले प्यार से फिर जोर जोर से. वो सिसकारी लेते हुए बोलने लगी- हाँ हाँ, और जोर से. इस बीच मैंने उसका ट्रैक पेंट भी नीचे सरका दिया और उसकी चड्ढी भी. उसने मेरा लंड दबोचा और मेरी जींस खोल के बाहर निकाल लिया. मैंने अपने हाथ से उसकी चूत में उंगली दे दी. उसकी चूत एकदम गीली थी पिछले एक घंटे की छेड़ छाड़ के कारण.

मैं थोड़ी देर उंगली करता रहा और उसके मम्मे चूसता रहा और वो मेरे लंड को हाथ में थामे सहलाती रही. फिर रुपिका का हाथ भी मेरे लंड पे आ टिका. मैंने भी उसकी चूची दबा दी. थोड़ी देर में उसकी कमीज और ब्रा भी उसके चूचों से ऊपर और उसकी पेंट और पेंटी उसकी टांगों से नीचे. मैंने दोनों की चूत में उंगली डाल दी. दोनों का शरीर एकदम कसा हुआ और गांड एकदम भरी हुई थी. अब शालू घूम के मेरे और रुपिका के बीच में यूँ आ गयी के उसकी गांड मेरी तरफ और मुंह रुपिका की तरफ. फिर वो थोड़ी झुक गयी. दोनों लड़कियों के मम्मे ट्रेन की छुक छुक के साथ आपस में टकरा रहे थे. मैंने थोडा नीचे झुक के अपने लंड को उसकी चूत में देने की कोशिश की तो हर तरफ नर्म नर्म मांस के लंड टकराता रहा लेकिन रास्ता कहीं न मिला. शालू ने नीचे हाथ डाल के मेरे लंड को रास्ता दिखाया और सेकंडों में मेरा लंड चूत में आधा घुसा हुआ था. शुरू में थोडा घर्षण हुआ लेकिन मैंने जोर से धक्का दिया और पूरा अन्दर. मैं थोड़ी देर अपनी जांघें उसकी गांड से लगाए खडा रहा, बिना धक्के दिए. ट्रेन के चलते चलते अपने आप ही हौले हौले धक्के लग रहे थे. मैं किसी जल्दी में न था और इस घटना के पूरे आनंद लेना चाहता था. मैंने रुपिका के चेहरे को अपनी और खींच के उसके ओठों को चूमा. फिर अपने अंगूठों और अँगुलियों से उसके निप्पलों को यूँ पकड़ा के घोड़े की लगाम पकड़ रखी हो. रुपिका ने उफ़ तक न की. फिर मैंने ट्रेन के धक्कों से मिलते धक्के लगाने शुरू कर दिए. पहले धीरे धीरे, फिर तेज़ तेज़. लौड़ा शालू की टाईट चूत में मस्त हुआ जा रहा था. मैंने रुपिका के निप्पल पकडे पकडे शालू के चूच्चे अपने हाथों के कप में पकड़ लिए और अपनी हथेली से उनपे भी च्यूंटी काटने लगा. मेरी जांघ पे शालू के कूल्हे जो उछल उछल के लग रहे थे तो लौड़े में और सनसनी सी दौड़ उठती थी.

मैंने झुक के रुपिका के ओठों को चूसना शुरू कर दिया. शालू ने घूम के मेरे ओठों से अपने ओंठ लगाने की कोशिश की तो तीनों के ओंठ आपस में टकराए. तीनों के ओंठ खुले खुले थे और तीनों ओंठ एक दुसरे पे कस गए और कसते चले गए जैसे जैसे मेरे धक्के तेज होते गए. जैसे जैसे मेरा लौड़ा फटने के मुकाम पे आने लगा, मेरे हाथ और जोर से लड़कियों के मम्मों पे कसने लगे. मेरे लौड़े से ज़ोरों से गरम गरम माल की बौछार शालू की चूत में होने लगी. मैंने धक्का मरना बंद कर दिया और अपनी जंग को एकदम ज़ोरों से शालू की गांड से सटा के लंड जितना अन्दर घुस सकता था, घुसा के खड़ा रहा. इतनी जोर से च्यूंटी मारी लड़कियों के मम्मों पे के दोनों के मुंह से सिस्कारियां निकल आया. मेरा लंड थोड़ी देर वीर्य विसर्जन करता रहा और धीरे धीरे सिकुड़ता रहा. शालू ने अपनी गांड दायें-बाएं यूँ हिलाई मानो मेरे लंड से बचा खुचा माल निकाल रही हो. मेरे मुह से आह निकल उठी. अब मेरा लंड एकदम सिकुड़ चूका था, बस सुपदा उसकी ज़ोरों से कसी चूत के मुंह पे फंसा था. मैंने निप्पल दबाने ज़ारी रखे और उसी मुद्रा में मुंह आसमान की और करके खडा रहा. ख़ुशी भी थी के इतनी माल लडकी का चोदन कर पाया और अफ़सोस रहा के ज्यादा लम्बा न चल पाया और रुपिका की न ले पाया.

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लौहपथगामिनी में मस्त मैथुन – 1

March 15, 2011 Leave a comment

बहुत दिन हुए मैं एक ट्रेन से वापिस घर आ रहा था. रात भर और पूरे दिन चल कर ट्रेन दिल्ली पहुँचती कोई २० घंटे में और आगे होती हुई जम्मू तक जाती. मुझे उतरना था दिल्ली, और मेरी स्लीपर टिएर में बुकिंग हुई हुई थी. हमेशा मेरी नज़र आस पास के माल पे रहती थी और कोई माल नज़र नहीं आती तो मैं पूरे टाइम सोता रहता था. कई बार पास बैठे लडकी के मम्मे छूने को और कभी कभी मसलने को मिल जाते थे. ट्रेन में चढ़ के बड़ी निराशा हुई क्यूंकि कोई भी महिला ४० से नीचे नहीं और ४० के ऊपर भी एक भी ठीक आकृति की नहीं. ऊपर से सारी सीटें भर चुकी थी और लोग कम से कम दिल्ली तक जा रहे थे तो किसी लडकी के बीच में आने की भी कोई उम्मीद नहीं. मैं कई बार जब किसी लडकी के ऊपर वाली सीट मिलती थी तो वो ऊपर मुंह करके सो रही होती थी और मैं नीचे मुंह करके रात में नीचे ज़रा झाँक झाँक के अपनी सीट पे घिस्से लगाता रहता. मेरी उम्र भी कोई १९-२० साल की ही थी तो मैं उतना परिपक्व नहीं हुआ था, कम से कम दिमागी तौर पे. चुदाई का भी कोई बहुत ज्यादा अनुभव नहीं था, लेकिन उदघाटन हो चुका था और कुछ एक बार चुदाई भी कर ही चुका था.  मैं जानता हूँ के आजकल के ज़माने में लोग बहुत जल्दी ये काम कर लेते हैं, लेकिन हमारे ज़माने में ऐसा नहीं था. खैर, कहानी आगे जारी.

तो कोई माल वाल न देख के हमने सोचा के इस बार आँखें या हाथ गर्म करने को न मिलेंगे. इस बार मेरी सीट थी किनारे पे, नीचे वाली. श्याम का वक़्त था तो मैं पसर के सो गया. रात में लोग आते जाते रहे मैंने आँखें न खोली के कहीं कोई रोजाना सफ़र करने वाला मुसाफिर जगह न मांग ले. फिर कुछ लडकीयों के हंसी मजाक करने की आवाज़ आयी तो मैंने आँखें खोली. मेरे डिब्बे में कई लडकियां, सब की सब स्पोर्ट्स-सूट में, और साड़ी १६ से १८ साल की उम्र में, एकदम तरोताजा, मांसल और भरी भरी, खादी बतिया रही थी. मैंने अपनी चद्दर ऊपर से हटाई और बाथरूम जाने के बहाने से सबसे सुन्दर लडकी, जो रास्ते में खड़ी थी, उसकी गांड पे हल्का सा लंड रगड़ते हुए निकल गया. वापिस आके देखा तो लडकियां पूरे डब्बे में फैल गयी थी और दौ लडकियाँ मेरे सीट पे बैठी थी, जिनमे से एक वही सुन्दर लडकी जिसे मैं घिस्सा लगा कर गया था. मेरे वापिस आने पे वो दोनों खड़ी हो गयी तो मैंने बोला के कोई बात नहीं, बैठ जाओ, मैं अभी सोने वाला नहीं. सो, मैं एक कोने में, सुन्दर लडकी मेरे साथ और दूसरी लडकी, जो खुद भी बड़ी हसीन थी, उसके बाजू में. मैंने सोचा ऐश हो गयी, थोड़ी थोड़ी रगडा रगडी होगी. मैं क्या जानता था के मेरी किस्मत खुलने वाली है.

थोड़ी देर में मैं उन लड़कियों से घुल मिल सा गया. बताया के मैं एक अभियान्त्रक हूँ, और अपने कॉलेज से वापिस घर जा रहा हूँ छुट्टियों के लिए. लड़कियों ने बताया के वो अपने स्कूल की वोल्ली बाल टीम में हैं और किसी राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेने जा रही हैं. किसी वजह से उन की सीट बुक नहीं हो पायी तो पूरी टीम ऐसे ही डब्बे में चढ़ गयी. उनके कोच महोदय भी ट्रेन में ही थे. युवा हृष्ट पुष्ट कन्याएं थी, हंसी मजाक में दिल्ली पहुँच जायेंगी, सो मामूली बात थी. मैंने सोचा रस्ते में जबरदस्ती किसी ठुल्ले से या रोज़-मर्रा वाले यात्रियों से तो इन कन्याओं के साथ वक़्त बिताना ज्यादा मजेदार है. मै अपनी ओढी हुई  चद्दर ले के  एक कोने में बैठा हुआ था. लड़कियों का नाम था शालू (माल वाली) और रुपिका, जो थोड़े गाँव वाली टाइप थी. शालू थी नागपुर से और बहुत बातूनी. थोड़ी देर में कोच महोदय आये और बोले के एक और लडकी के बैठने की जगह है साथ वाले खाने में, तो रुपिका भी चली गयी. लेकिन ज्यादा दूर नहीं, जहां हम बैठे थे, अगले ही खाने में वो और कोच हमारे सामने ही बैठे हुए थे. मैंने कहा – चलो अब खुल के बैठ सकते हैं. कहके मैंने चौकड़ी ऐसे लगा रखी थी के पहले हलके हलके मेरे पाँव साइड से उसके कूल्हों पर लगने लगे. एकदम भरे भरे गदराये चूतड थे उसके. मेरा सोच सोच के ही लंड खडा हो गया. शालू वहीं बैठी रही और टस से मस ना हुई. हम लोग वैसे ही बातों में मस्त रहे. वो पूछने लगी शौक वगैरा, वही लड़कियों वाले सवाल. मैंने कहा- मूवी, क्रिकेट, नोवेल पढना, वगैरा. वो बोली- और दोस्त बनाना, है ना? मैंने कहा- हाँ, वो भी. वो बोली- गुड, मेरी भी यही होब्बी है. मैंने दोस्ती का तो क्या अचार डालना था, और यकीन मानो दोस्तों, सुन्दर लड़कियों से दोस्ती से थोड़ा परहेज़ ही रखना चाहिए क्यूंकि दिन रात ललचाते रहते हो और हाथ में कुछ आता नहीं. चोदो और सरको, यही मन्त्र अपनाओ. खैर, मैं बातें भी करता और थोडा सा अपने पाँव उसके पीछे सरका देता. उसे बिलकुल ऐतराज़ न हुआ, और मैं पीछे से अपने पाँव से उसके कूल्हों को छू रहा था तो सामने बैठी रुपिका और कोच को दिखाई नहीं देता. थोड़ी देर में मेरी किताब देख के वो बोली- अरे, तुम भी ये सन-साइन वाली किताब पढ़ते हो. मैं थोडा झेंप गया. फिर उसने पूछा के वो मेरी किताब पढ़ सकती है क्या, मैंने अपनी किताब उसको पकड़ा दी. मेरे पास दूसरी किताब थी, जो मैंने निकाल ली. वो बोली- खुल के बैठ सकते हो, पैर फैला के, तो वो एक सिरे पे अपनी कमर लगा के बैठ गयी और मैं दूसरे सिरे पे. मैंने पीछे से अपनी टांगें पूरी लम्बी करके पूरी सीट पे लिटा ली और उसने सामने से. मैंने अपनी टांगों के ऊपर चद्दर डाल ली और अपने पावों से उसके नर्म नर्म कूल्हों को छूने लगा. यहाँ मैं एक बात साफ़ कर दूं के महिलाओं के लिए मेरे दिल में बहुत इज्ज़त है और पाँव से छू के मैं किसी तरह से महिला जात को बे-इज्ज़त नहीं करना चाहता. यह मेरे लिए सिर्फ वासना पूरी करने का जरिया है, और कुछ नहीं.

थोड़ी देर ऐसे ही माहौल बनता रहा. डब्बे में ज्यादातर लोग जगे हुए थे, लेकिन शोर भी काफी था. सो, हम लोग आराम से खुल के बात भी कर सकते थे लेकिन मैं और कुछ छुई-मुई नहीं कर सकता था. नौ-साढ़े नौ के करीब लोग लुढ़कने लगे. ऊपर बैठे महोदयों ने बत्ती भी बंद कर दी. लेकिन लौड़े की उछान से मुझे कहाँ नींद आनी थी. थोड़ी देर में रुपिका भी आ गयी, बोली के उधर लोग सो रहे हैं, लेकिन हमे बात करते देख के उसने सोचा वो भी आ के गप्प शप्प लगाए. मैं सोचने लगा – ये कबाब में हड्डी कहाँ से आ गयी. लेकिन उसके आने से एक काम तो हुआ के हम लोगों को थोड़ा टाईट हो के बैठना पड़ा. अब शालू बीच में आ गयी और रुपिका दूसरे कोने पे. मैं वैसे ही पीछे टाँगे बिछाए बैठा रहा, तो समझिये के शालू अब लगभग मेरे घुटने से थोड़ी ऊपर, लेकिन जाँघों से थोड़ी नीचे एकदम लग कर बैठी थी. उसके नाजुक नाजुक गोल-गोल चूतड ट्रेन के इधर उधर होने से रह रह के मेरी टांगों से टकरा जाते और लंड में सनसनी मचा जाते.

अब अँधेरे में मैंने थोड़ी हिम्मत बधाई और अपना बायाँ हाथ बढ़ा के हौले हौले शालू की कमर छूना शुरू कर दिया. शालू ने कोई आपत्ती नहीं की तो मैंने हाथ सरका के अपनी टांगों पे रख लिया, ताकि अब मेरा हाथ मेरी टांगों और उसके कूल्हों के बीच में आये. फिर मैंने हाथ घुमा के उसके चूतड को अपने हाथों में भर लिया. अब भी दोनों लडकिया इधर उधर की बातें कर रही थी. उनकी बातों से लगा के रुपिका शालू को अपनी बड़ी बहन की तरह मानती थी और हमेशा उससे चिपकी रहती थी. थोड़ी देर उसको देख के और उसके परिपक्व मम्मों को देख के लगा के उसकी दबाने में भी मजा आ जाए. लेकिन अभी मैंने शालू की गांड पे हाथ रखा हुआ था. फिर मैंने शालू की गांड को धीरे धीरे दबाना शुरू कर दिया. अब शालू थोडा घूम के बैठ गयी और मैंने तुरंत हाथ हटा लिया. मैंने सोचा के बस थोड़ी देर में थप्पड़ पड़ेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. मैं थोड़ी देर शांत बैठा रहा, वार्तालाप चलता रहा और शालू फिर मेरी और आके सट के बैठ गयी. मैंने अपना हाथ फिर उसके कूल्हों पे रख दिया और हलके हलके सहलाने लगा. कोई प्रतिक्रिया न होने पे मैंने अपना हाथ पीछे से उसके ट्रैक सूट के टॉप में सरका दिया और उसकी मांसल कमर सहलाने लगा. यकीन नहीं आ रहा था के इतनी माल बंदी मेरे साथ बैठ के मजे दे रही है. अक्सर थोड़े थोड़े स्पर्श के बाद लडकियां या तो परे हट के बैठ जाती हैं या किसी तरह से जता देती हैं के मैं गलत हरकत कर रहा हूँ. शालू  ने ऐसा कुछ नहीं किया इसलिए मेरी हिम्मत बढ़ती चली गयी. मैंने अपना हाथ पीछे से उसके ट्रैक पेंट में डालने की कोशिश की लेकिन बहुत टाईट था और मैं बहुत कोशिश के बाद भी हाथ न घुसा पाया. अब शालू हंस दी. रुपिका ने पूछा क्या हुआ, शालू बोली-कुछ नहीं, और बातचीत में लगी रही.
कहानी का दूसरा भाग अगले अंक में..

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