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ऑफिस की लड़कियों की चुदाई


अब भाई लोगों, जैसा मैंने आपसे पहले बोला था, मेरी सोच वक़्त में थोड़ी आगे पीछे जाती रहेगी. आप लोग सोच रहे होंगे, ऐसा क्या चौदु आदमी है जो इतनी लडकियां छोड़ बैठा है, तो मैं सिर्फ ये कहूँगा के अगर सिर्फ लडकियां चोदने की बात रहती तो ठीक है लेकिन ज़िंदगी में और भी काफी चीज़ें हैं, जो आपके पास हैं लेकिन मेरे पास नहीं. मेरी ज़िन्दगी सिर्फ चोद का प्रकरण बन कर रह गयी है. लेकिन उम्मीद है के इससे आपका मनोरंजन हो रहा होगा. कई बार कहानियां लिखते लिखते खड़ा हो जाता है तो या तो मुठियाना पड़ता है या किसी पुरानी महबूबा या रंडी के ठिकाने पे पहुँच जाता हूँ. खैर, सफाइयां बाद में, पहले आपको अपनी अगली कहानी सुनाता हूँ.

ये कहानी उन दिनों की है जब मैं ऑफिस में नया नया मेनेजर बना था. छोटी कंपनी थी, तो काफी ज़िम्मेदारी थी. अपने डिपार्टमेंट में लोगों को मैं ही भर्ती करता था. मुझे जानते हो समझ ही गए होंगे के मैंने माल लडकियां ठूंस ठूंस के भर राखी होंगी. खैर, केवल दौ लडकियां थी. लेकिन माल थी दोनों- एक मेरी सेक्रेटरी – दिल्ली की एकदम तेज़ और कॉलेज से ताजा निकली हुई लडकी और दूसरी चंडीगढ़ से- मेरे डिपार्टमेंट में इंटरप्रेटर का काम करती थी – यानी के जापानी से इंग्लिश और इंग्लिश से जापानी में ट्रांसलेट करती थी. दिल्ली वाली का नाम दिया शर्मा और चंडीगढ़ वाली का नाम अखिला बत्रा. दोनों बहुत ही सुन्दर, गौरी चिट्टी. दिया थोड़े पतले फ्रेम की- साढ़े पांच फूट लम्बी, एकदम मस्त फिगर – गौल गौल गांड, तीखे फीचर, एकदम पतली कमर, लेकिन मम्मे छोटे छोटे. ऊपर से शक्ल ऐसी के एकदम ताजा और नाजाकत से भरी. जब भी वो अपनी टाईट जीन पहन के आती थी, मैं उसको बार बार ऑफिस में बुलाता रहता था और जब वो उठ के जाती थी तो उसकी मचलती गांड को घूरता रहता था. अब ऐसी बातें छिपती नहीं हैं. उसने भी जाते जाते ऑफिस के दरवाजे में मुड़ के खड़े होके बातें करनी शुरू कर दी. अब हर बार यही होता – मैं उसे ऑफिस में बुलाता, थोड़ी देर बात होती, फिर जाते जाते वो दरवाजे में खड़ी हो जाती, मेरी और गांड करके और टाँगे क्रॉस कर लेती ताकि गांड पे और ज्यादा ध्यान जाए. बार बार मेरी नज़रें उसके मुस्कुराते चेहरे से फिसल फिसल के उसकी गांड पे आ गिरती. उसके जाने के बाद मैं देर तक लंड सहलाता रहता.

अखिला भी कोई कम माल नहीं थी, दिया से कोई ३-४ इंच लम्बी और भरे भरे मम्मे, मस्त गौल गुन्दाज गांड और बीच में लम्बी, पतली कमर, भरे भरे होंठ ऐसे के बस बैठ के या तो चूसते रहो या लंड मुंह में देके चुसाते रहो. जापानी कंपनी के साथ काम करके थोड़ी थोड़ी जापानी मुझे भी आती थी लेकिन मैं जब भी मौका मिलता था, बहाने से अखिला को बुला के कोई कांट्रेक्ट या ड्राइंग खोल के ट्रांसलेट करने बुला लेता था. वो अपनी कुर्सी एकदम मेरे साथ लगा के मेरे साथ बैठ जाती थी और मैं लंड खड़ा होने के कारण १० मिनट तक उठने लायक नहीं रहता था. उसका मुंह मेरे मुंह के इतने नजदीक होता था के बस ज़रा सा झुकूं तो किस्स हो जाए, लेकिन ऑफिस है सो सावधान रहना पड़ता था. ऊपर से उसकी मंगनी अभी हुई थी तो सोचा के ज्यादा चांस नहीं है. खैर मेरे जैसे तजुर्बेकार को पता होना चाहिए के ये सब चुदाई के रास्ते में नहीं आता. मेरे ऑफिस में और भी लोग थे, लेकिन मैं ही अकेला मेनेजर था और मेरे ही पास ओपेल एस्ट्रा कार थी, सो टौर मेरे ही थे. मैं लगातार दोनों को लाइन डालता रहता के कोई तो फंसे नहीं तो ऐसे ही देख देख के मजे लेते रहने में भी कोई हर्ज नहीं था मुझे. थी दोनों सहेलियां लेकिन मैं अनजाने में उनके बीच आ गया जिसका नतीजा आप थोड़ी देर में जान ही जायेंगे – कुछ अच्छा कुछ बुरा. शुरू ये कुछ इस तरह हुआ के मैं अखिला के साथ बैठा कुछ पेपर ट्रांसलेट कर रहा था के दिया आ गयी. जाते जाते उसने थोडा फ्लर्ट मारा-“बॉस कभी घुमाओ वुमाओ यार” तो मैंने कहा – “कोई नहीं शाम को क्लब चलते हैं.” दिया ने दरवाजे में अपने उसी अंदाज में खड़े होके मेरी और मुस्कान दी, अंगडाई सी दी और मेरी नज़र उसकी गांड पे जा पहुँची, बोली – “हाँ हाँ, जैसे ले जाओगे”. “अब की बार सच्ची ले जाऊंगा, मैं बुला.” मेरे कंधे पे हल्का सा एक नर्म और गर्म स्पर्श हुआ और अखिला बोली – “मुझे भी ले चलोगे?” था तो हल्का सा मजाक, लेकिन मेरी और झुकते हुए अखिला का मम्मा मेरे कंधे से रगड़ा गया था. मैं थोडा चौंक गया, अखिला संभली लेकिन दिया को नज़र आ गया. बोली – “हाँ, बॉस, दोनों को ले चलो”, फिर जाते जाते उसने आँख मारी और निकल गयी.
मुझे उसके बाद ज्यादा समझ में आया नहीं क्या करूं, श्याम को घर जाके मुठ्ठी मारी दोनों के नाम की तब जी को चैन पड़ा. फिर मैंने एक प्लान बनाया और उस प्लान के तहत काम करना शुरू कर दिया. अब तक मुझे एकदम साफ़ नज़र आ गया था के दोनों लडकियां चुदने पे आमादा हैं, लेकिन ऑफिस से बाहर मिलें तो कैसे. और वैसे भी पहले धीरे धीरे शुरुआत करने से गलतफहमी होने की सम्भावना कम रहेगी. अब मैं पूरा पलान बना के अगले दिन एकदम तैयार ऑफिस पहुँच गया. अखिला को अपने कमरे में बुला के पहले इधर उधर की बातें की, साथ में हिंट देता रहा पूछा के क्या किया कल रात, शनिवार को क्या कर रही है, वगैरा. एक बार भी उसने अपने मंगेतर का नाम लेके मूड खराब नहीं किया. फिर मैंने अपनी ड्राइंग्स खोली, और उसे अपने पास बैठाया. इस बार मैंने अपने कुर्सी उसकी कुर्सी के नजदीक खिसका ली. ड्राविंग बीच में रख के मैं थोडा और झुक कर अखिला के चेहरे के नजदीक अपना चेहरा ले आया. वो भी थोड़ी और नजदीक आ गयी. मैंने अपनी कोहनी उसकी और झुका दी तो उसने भी सट से अपना चूचा मेरे बाजू से लगा दिया. मैं थोड़ी देर ऐसे ही काम की नौटंकी करते हुए अपने बाजू से उसका मम्मा सहलाता रहा. उसका मम्मा पकड़ने की हिम्मत न हुई के कहीं कोई आ ना जाए. इतना सोचते ही दरवाजे पे किसी ने दस्तक दी, दिया थी. अन्दर आ के उसे माजरा समझ में आ गया.
मेरे बाजू से अखिला का मम्मा रगड़ते देख के वो थोड़ी झिझकी, लेकिन मैंने उसे अन्दर बुला लिया. “यार, मेरे बॉम्बे वाला इंस्पेशन कब है?”, मैंने पूछा तो बोली – “अगले हफ्ते, जाओगे क्या?”. मैंने बहाना बनाया – “हाँ, देख के लग रहा है जाना पड़ेगा, शायद अखिला को भी जाना पड़े, ट्रांसलेट करने के लिए.” अखिला के मम्मों का हिलना मुझे अपने बाजूवों पर महसूस हुआ. “चलोगी, अखिला?” मैंने पूछा. वो बोल पाती या बहाना बना पाती, उससे पहले मैंने कहा – “मेरी गर्लफ्रेंड भी आजकल बॉम्बे में है, तुम मिल भी लेना.” “ओह कूल, ज़रूर, बॉस.”, अखिला बोली.  “आपकी गर्ल फ्रेंड?”, दिया ने पूछा और अपने दोनों हाथ मेरे टेबल पे रख के मेरी और झुक गयी. उसकी बाहों के बीच में दब के मम्मे बीच में इकठ्ठे हो गए थे. वो थोड़ी और नीचे झुकी और मैं उसके शर्ट के ऊपर से झाँक पाया उसके मम्मे – एकदम दूधिया, चिकने और चमकदार, और इतने छोटे भी नहीं थे जितने मैं समझ रहा था. मैंने कहा – “हाँ, शिल्पा नाम है. तुमसे भी मिलवाऊंगा कभी.” खैर, ज्यादा कुछ नहीं उस दिन, बस अगले हफ्ते तक रोज़ अखिला के मम्मे अपने कन्धों से रगड़ते रहा. 

बॉम्बे का सिर्फ दौ दिन का टूर था, मतलब सिर्फ एक रात. अब मेरे पास मौका बहुत कम था- एक रात में अखिला की चुदाई कर पाऊँ तो कर पाऊँ, वापिस आ के दिया की नज़रों से छिप के चोदना मुश्किल है. आप सोच रहे होंगे मेरी बॉम्बे में गर्लफ्रेंड के बारे में – वास्तव में वो मेरी गर्ल फ्रेंड नहीं एक कॉल गर्ल है, जो मॉडल भी है. ये उन दिनों बॉम्बे में बहुत चल रहा था के काफी सारी मोड़ेल्स साथ साथ कॉल गर्ल का काम भी करती थी. नयी मॉडल के रेट- १०००० रुपये दौ घंटे के और २५००० पूरी रात के. टॉप मॉडल के २५००० दौ घंटे के और ५०००० से ले के एक लाख तक पूरी रात के. मेरी पहचान वाली मॉडल थी बीच की, लेकिन मैं उसका रेगुलर ग्राहक था तो कई बार पार्टीयों में भी साथ चले जाते थे. मैंने उसको फ़ोन करके बोला के एक रात हैं वहाँ, किसी तमीज वाली पार्टी में इन्वईट करो और एक लडकी साथ में है, जो इस टाइप पार्टी में कभी आयी नहीं है, उसकी चुदाई में मदद करवाए. शिल्पा सब समझ गयी और इस प्रकार अखिला की चुदाई की पूरी तैय्यारी हो गयी.

(to be contd….)

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