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माया मैडम


माया मैडम

 

मैं उसे अाश्चर्यचकित करना चाहता था, सो फ़ोन भी नहीं किया। दोपहर के दौ बजे थे – वो युनिवर्सिटी में होगी। दौ रास्ते थे, शाम तक ईन्तेज़ार कर सकता था, या नहीं। मैंने ईन्तेज़ार न करने का फ़ैसला किया अौर एयरपोर्ट से बाहर निकल कर सीधे जे.एन.यू. यानि कि जवाहरलाल नेहरू युनिवर्सिटी की टैक्सी ली। मेरी खुशी की सीमा न थी। एसा लग रहा था कि मेरी जिन्दगी का मक़सद अाखिर मुझे समझ में अा गया था। मैं कार की खिडकी से बाहर देखता जा रहा था। बारह साल किसी भी जगह से दूर रहना ही बहुत होता है यादों को विकृत करने के लिये, लेकिन दिल्ली इतनी बदल चुकी थी कि एकदम अलग शहर लग रही थी। जगह जगह पुल बने हुए थे, पुलों से नीचे झांक झांक के देखने पर जब कोई जानी पहचानी जगह नज़र अाती थी तो पता चलता था कि कहां हूं। मैंने हवा की महक लेनी चाही अौर कुछ अपनापन सा ढूंढना चाहा लेकिन सब कुछ एकदम अपरिचित लग रहा था, मानो एक दूसरी दुनिया हो। बिल्कुन नहीं लग रहा था कि इस देश में मैने अपनी करीब दौ-तिहाई ज़िन्दगी व्यतीत की थी। शायद प्रकृति मुझे अागे जो होने वाला था, उसके लिये तैय्यार कर रही थी।

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पुरानी पहचान

उस सुबह जब फ़ेसबुक में लॅागिन किया तो एक नया मैसेज अाया हुअा था, एक प्रो. माया शर्मा का, जो कि मेरे दोस्तों में से न थी अौर न ही मेरा कोई दोस्त उसके दोस्तों में था। थोडा दिमाग पे ज़ोर दिया लेकिन याद नहीं अाया के ये कौन हैं। जब मैसेज खोला तो लिखा था – “अगर ये ९९ की क्लास वाले अनिकेत हैं तो वापिस लिखना, मैं माया मैडम हूं।” पढ के याददाश्त के अाइने पर पडी धुंध एकदम साफ़ हो गयी। ये हमारे स्कूल की अन्ग्रेज़ी की मैडम थी। अपने पे शर्म भी अायी कि मैं कैसे माया मैडम को भूल गया। एक समय था कि मैं ५ साल तक लगातार उन्हीं के सपने लेता रहता था। स्कूल से निकलते ही मैं अमेरिका अा गया था अौर कभी माया मैडम से ना इ-मेल, ना फ़ोन पे कोई किसी प्रकार का कॉटैंक्ट रहा था। मुझे अमेरिका अाये हो भी १२ साल भी गये हैं। इस दौरान मेरी ज़िन्दगी इतनी बदल गयी थी कि स्कूल की कोई यादें मानो बची ही न थीं। लोग अपने बचपन के दोस्तों से पूरी ज़िन्दगी दोस्ती बनाये रहते हैं, लेकिन मुझे अपने विध्यालय के दोस्तों के नाम भी याद करने में मुश्क़िल हो रही थी। मैंने कभी उनके बारे में सोचा भी न था, कोई १२ साल से। भारत अाये हुए १२ साल हो गये थे, अब कोई वहां जाने का कारण भी नहीं रह गया था। बाकी पूरा परिवार ईंग्लैन्ड में मूव हो चुका था अौर मैं अमेरिका में अपनी कन्सल्टिन्ग कम्पनी चला रहा था। फिर मुझे माया मैडम से अपनी अाखरी मुलाक़ात याद अायी अौर ये भी याद अाया कि मैं क्यों सब कुछ भुलाये बैठा था। 

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पहला प्यार

 

जैसा कि अक्सर होता है, काफी लोगों का पहला प्यार होता है अपनी अध्य़ािपका के साथ। मेरे साथ भी कुछ ऐसा हुअा। लेिकन मेरी ये ऐकतरफा मुहब्बत साल दो साल नहीं, करीब छ: साल चली। मै अाठवीं कक्षा में था जब हमारी नयी मैँङम माया जी ने ज्ॊयन किया। उन की उम्र २२-२३ साल की होगी अौर एक दम रसभरे मम्मे, चूसने वाले अौंठ अौर अति सुन्दर चेहरा। उस समय मैं था १३-१४ साल का। हमारे स्कूल में छठी से बारहंवी तक सिर्फ लङकों वाले स्कूल में मात्र तीन चार महिला अध्य़ािपकाऐं थी, अौर वो भी ४० साल से ज्य़ादा की। जब माया मैङम स्कूल में पहली बार अायीं तो मानो भरी गर्मियों में ठंडी हवा का झोंका चल पडा हो। पीरीयङों के बीच जब भी किसी क्लासरूम के सामने से गुजरती थी, लङके खिङकियों से झांक झांक के अाहें भरने लगते थे। लूली तो खङी होती ही थी मेरी, अौर िकशोरावस्था में ज्यादा कुछ सूझता भी नहीं, पढाई का दबाव अौर लौङे का उठान, पूरी दुिनया भले ही जाये भाङ में। उपर से सिर्फ लङकों के विध्यालय के कारण यौनिक तनाव। माया जी ने एम. ए. किया हुअा था अौर वो अधिकतर अध्य़ापकों से अधिक पढी हुई थी सो वे सिर्फ़ ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षाअों को ही पढाती थी। 

 

रोज़ सुबह प्रार्थना का समय मेरे लिये दिन का सबसे अच्छा समय होता था कयुंकि उस समय माया मेम साब के दर्शन होते थे। मेरे साथ के सब लङकों को पता था कि मैं माया मैङम का कितना दीवाना था अौर वो मेरा मजाक उङाने का कोई मौका नहीं जाने देते थे। दिन-ब-दिन मेरे दिमाग में बस माया मैङम का फ़ितूर बढ़ता ही जा रहा था। हमारे पुरुष अध्यापक भी एक नम्बर के हरामी होते थे, हम तो बच्चे थे, वे हरामी हम बच्चों को तरह तरह की गन्दी कहानीयां सुनाते रहते थे, मुम्बई की रन्ङीयों से ले के अध्यापिकों की प्रेम कहानीयों तक, सब तरह के सच अौर झूठ! ऐसे ही एक दिन एक ऐसे अध्यापक ने माया जी के बारे में कुछ बताया तो मेरे कान खड़े हो गये। मास्थर हरबन्स जी बोले-बेचारी माया, शादी हो नहीं पा रही बेचारी की, क़या फायदा इतना पढ़ के। बच्चों ने थोडा अाश्चर्य जताया तो बोले, कोई नहीं, मजे तो मिल ही जाते हैं, हट्टे कट्टे लडकों को पढाती है। जब इनकी कलास लगती है तो ये आर्टस वाले लडके अन्दर से दरवाज़ा बन्द कर लेते हैं अौर उनकी कुर्सी को घेर के जी भर के मजा लेते हैं। अौर ज्यादा खुलासा करने से उन्होने मना कर दिया, ये कहके िक वो कोई अफ़वाह नहीं शुरू करना चाहते। वो तो हल्के से ये बात कह गये लेकिन मेरे दिमाग में ये बात छप गयी अौर अगले चार-पांच साल तक शायद ही कोई दिन गया हो जब मैंने इस बारे में न सोचा हो। मेरे जो इस उम्र में अपनी टीचर पे सेन्टी हुए हैं,उन्हे मेरे दिल की हालत पता होगी। मैंने दिन देखा न रात, बस माया मेम साब की क्लास के बारे में सोच सोच के इतनी मुट्ठ लगायी कि लन्ड में हर पल दर्द रहता था। मैं सोचता रहता था के क्लास में लङके क्या करते होंगे-मम्मे दबाते होगें या गाण्ड में हाथ दे देते होगें। इन्हीं सवालों में मैं अगले कई साल उलझा रहा। फिर एक दिन मैंने अपने स्कूल के बाथरूम की दीवार पे लिखा देखा – “माया की फुद्दी लाल है”! अब मेरी “imagination” की कोई हद नहीं थी। अब सोचता हूं तो हंसी अाती है, उस समय मुझे ये भी नहीं पता था कि फ़ुद्दी, यानि की चूत दिखती कैसी है। पहली बार चूत के, या यूं कहिये चूत की फ़ोटो के दर्शन मैंने अगले साल किये थे जब क्लास का एक लडका न जाने कहां से एक पेंटहाउस ले अाया था अौर पूरी क्लास को दिखा दिखा के रौब झाड रहा था। हमारे इतिहास के अध्यापक जी ने देख लिया अौर डांट डपट कर के बेचारे की मैगज़ीन, जो उसका कोई चचेरा भाई अमेरिका से ले अाया था, हडप ली। बेचारा घर या स्कूल में शिक़ायत लगाने लायक भी नहीं था। खैर, मैं यूंही बहाव में बह गया, हँा, मैं बता रहा था कि मैं माया मैडम के बारे में सोचता रहता था – शायद माया जी क्लास में बिना पेंटी के साङी पहन के अा जाती हैं अौर लङके या तो झुक झुक के उनकी टागों के बीच से उनकी चूत के दर्शन करते रहते हैं या उनकी साङी ही उठा या उतार लेते हैं। मेरा बाल मन उस समय इस बात के सिवा कुछ सोच नहीं पाता था। मेरी िज़न्दगी का सिर्फ एक उद्देश्य था-ग्यारहवीं कक्षा में अार्टस में दाखिला लेना अौर माया मैङम के मजे लेना। लेकिन हमें माया मैङम की क्ळास में बैठने के लिये ग्यारहवीं तक इतेंज़ार नहीं करना पङा।

 

हुअा यूं कि जब हम नवीं कक्षा में थे तो एक दिन हम जब अन्गरेज़ी की क्लास में अपने मास्टर का इन्तज़ार कर रहे थे तो मेरा बेन्च मेट, यानी कि वो लङका जो हमेशा मेरे साथ बेन्च पे बैठता था अौर जिसके सूखेपन के कारण हम जिसे “हङ्ङी” बुलाते थे, मुझसे बोला – “अाज तो मौजें अा गयी, माया मैङम पढाने अायेगीं।” ये बात मुझे अाज तक समझ में नहीं अायी कि हङ्ङी जैसे लोग, जो पढाई में एकदम कमज़ोर, हर मास्टर से पिटने वाले, हमेशा ऐसी खबरें कहां से पकड लाते हैं, अौर वे सच भी होती हैं।  हङ्ङी बोला – “मास्टर बीमार हो गये अौर माया मैङम उनकी जगह अायेगीं, अगले पूरे हफ्ते।” मेरी खुशी की सीमा न रही। शायद हमें भी पता चले कि ये सीनीयर क्लास वाले क्या मजे लेते हैं। 

 

अब मैं अव्वल अाने वाले लडकों में था, सो अव्वल अाने वाले लडकों की तरह सामने वाले डेस्क पे बैठता था। टीचर का डेस्क मेरे डेस्क के एकदम सामने वाला बेचं था, जो िक िवध्यार्थीयों वाले बेचं जैसा ही था, बस घुमा के क्लास की तरफ मुहं करके रखा हुअा था। अब अाप समझ ही रहे होगें के ये बात कहां जा रही है। माया मैडम क्लास में अायी, हम सब लोग खडे हुए। मैडम ने सबको बैठने के लिये कहा, बताया के हमारे मास्टर बीमार हैं इसलिये अगले पूरे हफ्‍ते वो ही हमें पढायेगीं। मुझे तो यूं था िक पूरी िज़न्दगी भी पढायें तो बस न हो। इतने नज़दीक से मैडम और भी सुन्दर लग रही थी। दिल करता था कि बस उन्हें देखे जाऊं। खैर मेरा बालमन न जाने कयूं सोच रहा था कि मैडम के अाने से लडके अन्दर से क्लास का दरवाज़ा बन्द कर लेगें अौर कुछ मैडम के चूच्चे वूच्चे दबायेगें। ऐसा कुछ न हुअा। अब सोचता हूं तो शर्म भी अाती है कि मैं न जाने किस तरह की वहशीयत में था कि एक महिला के यौन शोषण के नाम से कई साल मुट्ठ लगायी।

 

जैसा कि मैंने पहले लिखा, मैं पढाई में थोडा ठीक था। मैडम ने अगले पूरे हफ्‍ते सिर्फ़ हमें होम वर्क दिया और कक्षा में सवाल दिये, कुछ नया नहीं पढाया। मैं हमेशा जवाब देने में तत्पर रहता था, अौर वो मुझसे बहुत खुश भी थी। लेकिन बाकी कक्षा ने उन्हे ज्यादा इम्प्रेस नहीं किया। हमेशा बोलती रहती थी के विश्वास नहीं होता कि हमारे मास्टर ने हमें ये भी नहीं सिखाया। मुझे अपनी नज़रें मैडम की साडी के पीछे से झांकते ब्लाउज़ से हटानी मुश्क़िल रहती थी। हड्डी की तो रोज़ पिटाई होती थी लेकिन वो मैडम से पिटने में खुश होता ज्यादा नज़र अाता था। लेकिन हड्डी ने शरारत में एक काम ऐसा किया, जिसका मैं कई साल शुक्रगुज़ार रहा। वो मजे में बार बार मेरा पेन ले के ज़मीन पे फेकं देता। मुझे पहली बार तो समझ नहीं अाया लेकिन जब उसने पूछा कि मैडम ने नीचे क्या पहन रखा है, तब मुझे समझ में अाया िक असली मक़सद क्या है। थोडी देर में हड्डी ने फिर मेरा पेन गिरा दिया। पहली बार जब मुझे अदेंशा न था तो डर नहीं लगा था, अब झुकते डर लग रहा था कि पकडा गया तो मैडम न जाने क्या सोचेगीं अौर बेकार में पिटाई होगी या घर शिकायत होगी। मैं डरते डरते झुका अौर बेन्च के नीचे पेन टटोलते हुए मैडम की टागों की अौर देखने लगा। मैडम ने साडी पहन रखी थी अौर उनके दोनों पैर ज़मीन पे थे। मेरे देखते देखते मैडम ने अपनी एक टागं उठायी और दूसरी टागं पे रख दी। दूसरी टागं से साडी घुटने तक चढ गयी थी। 

 

देख के मेरा बुरा हाल हो गया, समय जैसे एकदम रुक गया। मैं भूल गया कि मैं झुका किसलिये था और मैडम की मक्खनी टागों को घूरने लगा। दिल किया कि इन प्यारी प्यारी टागों को अपने हाथों से हल्के हल्के सहलाऊं, अपनी जीभ से जम के चाटूं, लडं के सुपाडे को मैडम की त्वचा पे रगडूं, घुटने के पिछली तरफ़ के नर्म भाग में लन्ड बिठाऊं। मैं यूहीं इन प्यारे प्यारे ख्यालों में गुम था कि हड्डी ने मेरे कधें पे हाथ रख के हिलाया – “अबे उठ, पिटेगा क्या?” मैं होश में अाया तो सुनाई दिया के मैडम मेरा नाम बुला रही थीं। मैं हडबडा के बैठा तो मुझसे पूछा – “क्या कर रहे थे?” मैंने बताया कि पेन गिर गया था। मैडम ने एक मुस्कान के साथ कहा कि कोई बात नहीं, क्लास एक सवाल का जवाब नहीं दे पा रही, तुम जानते हो क्या? मैडम ने सवाल पूछा और मुझे जवाब तो तब अाता जब मैं सवाल समझने की हालत में होता। मैडम बोली -“तुम्हारी पहली बार है कि तुम जवाब नहीं दे पाये लेकिन तुम्हे कोई स्पेशल ट्रीटमेन्ट देना जायज नहीं होगा, सो सज़ा मिलेगी।” मेरी सज़ा ये थी कि मैं अगली थोडी देर के लिये “मुर्गा” बनूं, मैडम के पास में। मैं बेन्च से बाहर अाके मैडम की और मुहं करके मुर्गा बन गया। मैडम ने बाकी क्लास को पढाना ज़ारी रखा। मैं मुर्गा बने मैडम की टागों की और देखता रहा। मैडम ने अपना एक पांव दूसरी टागं पे चढा के रखा हुअा था अौर उन के घुटने तक की नन्गी टागों के दर्शन से मेरी अाखें गर्म हुए जा रही थी। वैसे तो मुर्गा बनना बडे शर्म की बात थी नवीं क्लास के छात्रों के लिये, लेकिन इस समय मेरे दिमाग में सिर्फ़ वासना भरी थी अौर अाखों में सिर्फ़ मैडम की टागों के नजारे। मुझे ये समझ में नहीं अा रहा था के मुझे सज़ा मिल रही है या ईनाम। जो भी हो, मुझे कोई शिकायत न थी। मैं नीचे से मैडम की टागों को यूंही घूरता रहा। सबसे ज्य़ाादा जिज्ञासा मुझे इस बात की थी कि घुटनों के उपर वाली अौर, जहां कपडों के अन्दर अन्धेरे के कारण कुछ नज़र नहीं अा रहा था, मैडम का जिस्म कैसा होगा? मैडम के घुटनों के दोनों अौर वाले गहराव में मैं जब अपनी जीभ फिराऊगां तो कया उन्हें गुदगुदी होगी। मेरे सोचते सोचते कोई ५ मिन्ट गुज़रे होंगे कि मैडम ने बोला – “बस बहुत हो गया, अब अपनी सीट पे जाके बैठ जाअो”। बडी मुश्किल से अपनी पैंट में लन्ड के तनाव को छुपाने की कोशिश करते हुए मैं अपनी सीट पे गया लेकिन मुझे अाज भी पूरा विश्वास है कि पूरी क्लास से अौर कम से कम मैडम की अांखो से पैंट के उपर उपर से मेरा खडा लंड न छुप पाया। मैडम बस मुस्कुराती रही। बचे हुऐ पीरियड में मै बस मैडम की टागों के सपने लेता रहा। पूरे हफ्‍ते ये रोज़ का खेल सा बन गया, हड्डी मेरा पेन नीचे गिराता, मैं जी भर के अांखे भर लेता, मैडम मुझसे सवाल करती, अधिकतर तो मैं बता पाता, नहीं तो मुर्गा बनके मैडम की टांगो का दीदार करता। सप्ताह कब गुज़रा, पता ही नहीं चला। उस के बाद, नवीं अौर दसवीं क्लास में मैं जब भी क्लास के बाहर माया मैडम, जो हमें अब पढाती नहीं थी, मिलती थी, मैं नमस्ते करना नहीं भूलता था। मेरी ज़िन्दगी का अगला मक़सद था ग्यारहवीं में अार्टस् में दाखिला लेना अौर माया मैडम के मजे लेना।

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एक दिलासा

मैं यहां उन सबको, जिन्होंने इतने सब्र से मेरी कहानी यहां तक पढी है, धन्यवाद अौर ये दिलासा देना चाहता हूं कि अगर अाप इस कहानी में चुदाई का इन्तज़ार कर रहे हैं, तो चुदाई होगी अौर ज़रूर होगी। एक नहीं, बहुत बार होगी। जैसे अापने सोचा, वैसे होगी अौर जैसे अापने नहीं सोचा होगा, वैसे भी होगी। ये कहानी चुदाई, जुदाई, तन्हाई, भावनाअों, एक भावना नामक लडकी अौर अौर भी ज्यादा चुदाई की कहानी है, अत: थोडा सब्र रखें।

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एक पुराना मौसम लौटा

 

मेरे दिमाग में पुरानी एक खुश्बू सी भर गयी थी, किसी व्यक्ति या जगह की नहीं, समय की। मेरे अाठवीं से बारहवीं कक्षा तक के समय की। इस खुश्बू ने मुझे एकदम तरोताजा सा कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि एक दरवाजा खुलेगा अौर मैं अपने पुराने स्कूल में प्रवेश कर लूगां। मैने इतने लम्बे समय से उस समय के बारे में सोचा नहीं था अौर अब अचानक मेरा दिल वापिस जा के एक बार अपने पुराने स्कूल में जाने को हो उठा। मेरी बेताबी की भी सीमा न थी। कोई बारह साल बाद अाज माया मैडम से मुलाक़ात होगी। मैं एयरपोर्ट के अागमन सेक्शन के बाहर फूलों का एक गुलदस्ता ले के एक घन्टे पहले ही पहुंच गया था। सोच रहा था कि पता नहीं इतने समय के बाद पहचान भी पायेंगे एक दूसरे को या नहीं। माया मैडम क्या अब भी पहले जैसी सेक्सी होगंी के नहीं। फ़ेसबूक पे उन्होंने तस्वीरें नहीं लगायी थीं, ना ही अपना वैवाहिक “status” “post” किया था। फ़ोन पे भी जब बात हुई तो मुझे पूछना थोडा अजीब लगा कि अापने शादी कर ली के नहीं। अपने बारे में तो मैंने ख़ुद ही बता दिया था लेकिन माया मैडम ने कुछ न बताया अपने बारे में। मेरी अधीरता बढती जा रही थी। इतने समय से उन्हे एकदम भुलाये बैठा था अौर अब सारी यादों की कसर एक बार में निकल रही थी। मैंने सोचा कि बेताबी का हश्र तो बुरा ही होना है। पिछली बार में अौर अाज में मुझ में भी काफ़ी परिवर्तन अा चुके होंगें, भले ही मुझे पता चले या ना चले। मेरी खूबसूर्ती की परिभाषा भी तब से अब तक बहुत बदल चुकी होगी। वैसे भी माया मैडम खाली मिलने ही तो अा रही हैं। लेकिन उतसुक्ता बढती ही गयी अौर उतसुक्ता के साथ साथ एक अौर चीज़ हुई – मेरा लन्ड़ एकदम सख्त हो गया। मैं बेंच पे बैठ गया ताकि अास पास के लोगों को न दिखे। बीच में दौ बार बाथरूम भी हो अाया लेकिन अकडन कम न हुई। 

 

अाखिर माया मैडम का जहाज अड्डे पर उतरा। बाहर अाने में अाधा घन्टा अौर लग गया, ईम्मिग्रेशन अौर कस्टम से निकलते निकलते। बाहर अाते लोगों की भीड़ में मेरी नज़रें माया मैडम को ढूढं रही थी। जब अाखिर माया मैड़म नज़र अायीं, तो उन्होंने ही मुझे पहचाना अौर दूर से हाथ हिलाया। एसा होने के मुख्य दौ कारण थे। पहला तो मुझे अपनी अाखों पे विश्वास न हुअा- मैं न जाने कयों साडी में लिपटी एक ३६-३७ वर्षीय थोडी थुलथुल सी दिखने महिला की अपेक्षा कर रहा था। माया मैड़म एकदम मॉडल की शेप में थी, एक टाईट गुलाबी टी शर्ट, जिसमें उनके टाईट मम्मे उनके कदमों के साथ उठ गिर रहे थे, अौर नीचे काली कैपरी में हर अाने जाने वाले के दिल पे छुरी चल रही होगीं। मेरे साथ दौ स्तरों पे दौ-दौ बातें हुईं – शारीरिक तौर पे मेरे लन्ड़ ने एक साथ फ़ुफ़ंकार अौर अंगड़ाई ली, अौर मानसिक तौर पे अफ़सोस हुअा इतने लम्बे समय दूर रहने का, साथ साथ खुशी भी हुई कि कम से कम अब तो मिल पा रहे हैं। मेरे दिमाग में बारह साल पहले की जो छवि थी, मैडम उससे भी ज्यादा सेक्सी दीख रही थीं। 

 

दूसरा कारण मैं माया मैड़म को नहीं पहचान पाया ये था कि मैं न जाने क्यूं ये मान के बैठा था कि मैड़म अकेली अा रही होंगी। लेकिन उन के साथ एक अप्सरा या कम से कम अप्सरा सी दिखने वाली एक बहुत ही सुन्दर लडकी, जिसकी उम्र २१-२२ साल की रही होगी, थी। इस लडकी के बाल खुले खुले, चेहरा बिल्कुल तरोताजा, चौबीस घंटे के सफ़र की थकान का नामोनिशान तक नहीं, चेहरे पर मेकअप भी एकदम दुरुस्त। मैंने सोचा उतर कर शायद सबसे पहला काम मेकअप का टच-अप ही किया था। उसने भी एक टाईट टी शर्ट, जो कि स्पोर्ट ब्रा जैसी ज्यादा थी पहन रखी थी। उसकी हरी टी शर्ट जो उसके नाजुक पतले शरीर पे मानो गलती से लग गये मोटे मम्मों को ऐसे दबा के रखे हुए थीं जैसे अड्डे पे खडे सब मर्द, जिनकी अाखों ने गल्ती से भी उसकी अौर देख लिया हो, अौर शायद कुछ अौरतें भी (अाखिर सान फ़्रासिंस्को शहर है), दबाना चाह रहे होगें। नीचे टाईट स्लैक्स, वो भी घुटनों तक। उस का रंग भी ऐसा जैसा सिर्फ़ भारतीय लडकियों का हो सकता है – गौरी भी अौर लाली से भरी हुई भी। यहां ये कहना ज़रूरी है कि दोनों इतनी सुन्दर लग रही थीं कि ये फ़ैसला करना मुश्क़िल था कि कौन ज्यादा माल है। ऐसे सज धज के अायी थीं दोनों जैसे किसी फ़ैशन-शो में जा रही हों। मैंने एक पल को सोचा कि ये “fob effect” है, यानि कि ये लोग ये सोच के अायी हैं कि अमेरिका में लोग हमेशा ऐसे ही कपडे पहन के रखते हैं। खैर, मुझे क्या, मेरी तो अाखें सिकती रहेगीं। बाहर अाते ही माया मैडम ने बहुत खुश होते हुए जोर से मेरा नाम पुकारा अौर मुझे एक जबर्दस्त जफ्फी दी यानि कि अागोश में भर लिया। मैंने भी माया मैडम को अपने अागोश में ले लिया अौर अाखें बन्द कर ली। बहुत समय बाद किसी से मिल कर अपनापन लग रहा था। माया मैडम के मम्मे मेरी छाती से सटे हुए मेरे जोरदार अागोश में दबे तकियों से महसूस हो रहे थे अौर मेरे दिल को एक सूकून सा दे रहे थे। माया मैडम ने पहले अपनी बाहें खोली अौर मुझे भी अालिगंन मुक्त होना पडा। माया मैडम से थोडी हंसी या खुशी दबायी नहीं जा रही थी लेकिन उसमें थोडा अजीबपन था, जो मुझे उस समय समझ में नहीं अाया, जो शायद अच्छा भी था। शायद मेरा खडा लन्ड माया मैडम के पेट में लगा होगा, अगर उस समय मेरा ध्यान इस बात पे चला जाता तो मैं शर्म के मारा शायद उन लोगों से बात भी न कर पाता। माया मैडम मुस्कुराते हुए बोली- “कैसे हो, अनिकेत! कितने, करीब १२ साल हो गये हैं ना?” मुझे सुन के अच्छा लगा, मैं अकेला ही नहीं था जिसने पिछली मुलाक़ात से अब तक का पूरा हिसाब लगा रखा था। मैंने हॉं में जवाब दिया अौर पूछा – “अाप कैसी हैं, माया मैडम?”

“मुझे सिर्फ़ माया बुलाअो, अनिकेत। मैं बहुत अच्छी हूं अौर अब तुम से मिल के अौर भी अच्छी हो गयी हूं।”

 

मुझे माया मैडम के सीधे सीधे कहने के अन्दाज़ से थोडा अजीब सा लगा अौर थोडी सुखद अनुभुति भी हुई। मैं कुछ जवाब देता, इससे पहले माया मैडम ने अपने साथ अायी अप्सरा से परिचय करवाया। 

“ये हैं मेरी पूर्व-स्नातक छात्रा, श्रेया, डॉक्ट्रेट कर रही है, ये भी मेरे ही प्रोजेक्ट पे काम कर रही है, ईसीलिये ये भी साथ अायी है।”

माया ने बताया तो था किसी प्रोजेक्ट के बारे में, कोई किसी स्कोलरशिप या ग्राटं से पैसा मिला है कुछ “sociology” की “research” करने के लिये। “research” थी अमेरिका के समाज के बारे में ही, कुछ महिलाअों के हक़ या ऐसे ही किसी चीज़ के बारे में। मुझे ये समझ में नहीं अाया कि इस “research” के लिये किसी को भारत से बुलाने की क्या ज़रूरत थी। लेकिन मेरी समझ में अौर भी बहुत सारी बातें नहीं अाती, इसलिये मैंने ये सोचने में ज्यादा दिमाग नहीं लगाया।

“हेल्लो, हाउ अार यू!”, श्रेया ने दिल्ली की अन्ग्रेजी के लहजे में कहा

“अाई ऐम फ़ाईन, हाउ अार यू!” 

 

मेरी झिझक लगातार बरकरार रही, लेकिन बातें फिर भी चलती रहीं। मैंने उनके सामान की ट्रॉली ली अौर उन्हे अपने साथ पार्किंग में ले गया। सामान अपनी कार में रखा। शाम के सात बजे थे। मैंने पूछा – “डिन्नर का क्या प्लान है, माया मैडम?” माया मैडम ने अनसुना कर दिया तो मैं बोला, “अ …, माया, डिन्नर का क्या प्लान है?” माया ने मुस्करा के मेरी अौर देखा – “भूख तो लगी है, प्लेन का खाना अच्छा नहीं था, मैंने तो कम ही खाया।” श्रेया को भी भूख लगी थी, तो मैंने एक अच्छे रेस्टॉरेन्ट का नाम सुझाया, जो देखने में भी बहुत अच्छा है अौर खाना भी ठीकठाक है, वो कुछ भी खाने को तैय्यार थी। 

खाना खाके वापिस उनके होटेल तक पहुचंते पहुचंते दस बज गये। मुझे हैरानी सी हुए कि ग्राटं से इतने अच्छे होटेल में रुकने के लिये कैसा बहाना पडता है। खैर, सरकार का काम, सरकार जाने। 

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लम्बी चुदाई

 

होटेल पहुंच के माया ने बोला कि उपर अा जाअो रुम में, थोडी देर बातें करते हैं, पिछले बारह सालों की कहानी सुनाते हैं। माया अौर श्रेया दोनों एक ही “सुईट” में थे। सुईट में एक पूरा बेडरूम था, जिसने दी “फ्ुल साईज़” बिस्तर थे एक बडा टी वी, एक सोफ़ा चेय़र अौर एक अटैचड बाथरुम। एक बाथरुम बाहर भी था। एक तरफ़ पूरी रहोई थी, माईक्रो-वेव अौर फ़्रिज के साथ, एक तरफ़ एक छोटा सा ऑफ़िस अौर एक बडा सा एरिया, जहां दौ सोफ़ा, एक कॉफ़ी-टेबल अौर एक अौर बडा टी वी रखा था। हम सुईट के लिविंग रुम में बैठे काफ़ी देर गप्पें लगाते रहे। मेरा वहां से उठ कर जाने का बिल्कुल भी दिल नहीं कर रहा था अौर लग रहा था कि माया अौर श्रेया को भी मेरी संगत कोई बुरी नहीं लग रही थी। अाखिर जब मैंने उठ कर जाने का अनमना सा प्रयास किया तो माया ने कहा -“चाहो तो यहीं रुक सकते हो। मैं अौर श्रेया एक बिस्तर पे सौ जायेंगे अौर तुम दूसरे पे। मेरे दिल में एकदम लड्डू फूटने लगे। अाज रात कुछ होने वाला तो है।

 

पहले बाथरुम में जाके श्रेया कपडे बदल के एक नाईटी में अायी तो माया कपडे बदलने अन्दर चली गयी। मैं अपने पूरे कपडों में बिस्तर के किनारे बैठा था। लन्द रह रह के किसी अपेक्षा में फुदक रहा था। श्रेया मेरे पास अाके खडी होके बातें करने लगी तो मुझे उनके कपडों के झीनेपन का अाभास हुअा। पीछे से अा रही रोशनी से उसने पूरे बदन की हदें कपडों के बाहर से ही साफ़ दिखाई दे रही थी। उसने सफ़ेद ब्रा अौर सफ़ेद पेंटी पहन रखी थी। मैंने सोचा कि ये रोज ब्रा पहन के सोती है या अाज मेरे कारण पहन रखी है। खैर, उस के गौल मम्मों को ब्रा के भींचने की सोच से मेरे लौडे ने एक दमदार हिचकी ली अौर मैंने जानबूझ के कोई कोशिश नहीं की ये छुपाने की। जब माया बाहर अायी तो माया ने भी एकदम वैसी ही झीनी नाईटी पहन रखी थी। उसके भी कपडों में से प्रकाश अाराम से अन्दर बाहर जा के बता रहा था कि अन्दर सफेद ब्रा अौर सफेद पेंटी पहन रखी है। मैंने सोचा कि एसा कैसे हो सकता है, ये लोग क्या साथ शॉपिंग करते हैं? दोनों गुडनाईट बोल के एक बिस्तर पे लेट गयी अौर मैं दूसरे पे। माया मेरे बिस्तर से परे वाली तरफ लेटी अौर श्रेया मेरी अौर लेट गयी। सोने से पहले श्रेया के शरारत वाले अन्दाज में कहा था- “ंमैंने सब देख लिया था।” मुझे समझ में अाने में वक़्त न लगा कि उसने मेरा खडा लन्ड देख लिया था। इसी विचार से मेरा लन्ड खडा हो गया कि श्रेया जैसी सुपर मॉडल जैसी लडकी ने मेरे खडे लन्ड पे नजर डाली, मेरी पेंट के उपर से ही सही। 

 

थोडी देर में लगा कि दोनों सो गयी। मुझे नीन्द नहीं अा रही थी। लौडा परेशान कर रहा था। मुझे समझ में नहीं अा रहा था कि अगले कुछ घन्टों में चुदाई के मौके का इन्तेज़ार करुं या लगा लूं मुठ्ठ। लडकियां बाथरुम की रोशनी जला कर सोयीं थीं, सो कमरे में हल्की हल्की रोशनी थी। मैंने अपनी पेंट का बटन खोला, चेन थोडी नीचे की अौर पेंट को ढील देके अपने कून्हों से नीच सरका दी। फिर मैंने अपना हाथ अपने कच्छे में डाल लिया अौर घूम के लडकियों की अौर मुंह करके लेट गया। माया अपनी पीठ के बल लेटी थी अौर श्रेया माया की अौर मुंह करके लेटी हुई थी। अब अमेरिका में ये थोडा अजीब लगता लोगों को, लेकिन हम हिन्दुस्तानीयों के लिये बिस्तर शेयर करना अाम बात है अौर हम इस बारे में ज्यादा सोचते भी नहीं। मैंने देखा कि श्रेया के शरीर से चादर पूरी उतर कर उसके नीचे पहुंच चुकी थी। मैं घूम के उनके बिस्तर की अौर मुंह करके लेट गय। मेरा हाथ अब भी मेरे कच्छे के अन्दर था। हल्की हल्की रोशनी में श्रेया के पीछे से उसके शरीर के चढाव उतराव देख के लन्ड प्रचण्ड हुअा जा रहा था। मैं ने लन्ड को सहलाना शुरु कर दिया। श्रेया की सांसों के साथ उसकी गाण्ड हल्के से उपर नीचे होती तो दिल में हाय हाय मच जाती थी। फिर मैंने देखा के श्रेया ने अपने एक हाथ से अपनी टांग को जरा सहलाया। मैंने फ़टाफ़ट अपना हाथ अपने लन्ड से हटाया कि कहीं श्रेया उठ न जाये अौर मुझे मुठियाते न देख ले। लेकिन उसने सिर्फ़ अपनी टांग जरा सहलायी अौर हाथ वापिस उपर कर लिया। लेकिन उसके टांग सहलाने का असर ये हुअा कि उसकी नाईटी अब उसके घुटने अौर गाण्ड के बीच तक उपर सरक चुकी थी। मेरे देखते देखते श्रेया थोडी अौर “एडजस्ट” हुई अौर अब उसकी पेंटी की सरहद के दर्शन होने लगे। मेरा दिल मेरे हलक में अा टिका। मुझे लगा कि श्रेया ये जान बूझ के कर रही है। मैंने थोडी देर अौर इन्तेज़ार किया, जिस दौरान श्रेया ने थोडा अौर अपनी टांगो को छुअा अौर अपनी नाईटी को अौर उपर चढा लिया। अब मुझे यक़ीन होने लगा कि श्रेया जान बूझ के ये कर रही है। मैंने थोडा महसूस करने की कोशिश की कि माया तो जगी नहीं हुई, कोई अावाज नहीं अायी। मैंने थोडी हिम्मत करके उचक के देखा, वो दूसरी अौर मुंह कर के सो रही थी। उसकी सांसों से पता चल रहा था कि वो बहुत गहरी नींद में सोई हुई थी। 

 

हवस में अादमी ज्यादा सोच नहीं पाता अौर बेबस हो के हालात के हाथों मजबूर हो जाता है। कई बार जो बात सपने में भी नहीं सोच सकता, कर भैठता है। मैंने किसी तरह ख़ुद को बहला लिया कि श्रेया जान बूझ के मुझ पर चक्कर डाल रही है। मैं अपने बिस्तर से उठा अौर श्रेया के पीछे जा खडा हुअा। मैंने पेंट तो उपर सरका ली थी, लेकिन बटन खुला था। मैंने श्रेया के मुंह की अौर झुक कर टोह लेने की कोशिश की लेकिन पता नहीं चला कि जाग रही है या सो रही है। मैंने हल्के से उसके कानों पर फूंक मारी, उसके मुलायम बाल थोडे हिले लेकिन वो मानो दम साध के अांखे भींचे सोई थी। मैंने थोडी हिम्मत करके उसकी नाईटी के निचले सिरे को जरा सा उठाया, श्रेया टस से मस न हुई। अब मैंने अपना होंसला अौर बढाया अौर अपना हाथ श्रेया की नंगी टांग ले उपर रख दिया। उसके गरमागरम अौर नरमानरम मांस से टकराते ही मुझे एक जोरदार कम्पन महसूस हुअा लेकिन ये समझ में नहीं अाया कि मेरे शरीर से था या श्रेया के। 

 

समय काफी देर यूंही रुका रहा। मैं हाथ रखके दम रोक के बैठा रहा अौर श्रेया भी एकदम दम साध के पडी रही। जब काफी देर तक कुछ न हुअा तो मेरा हाथ अपने अाप श्रेया की टांग पर रेंगता हुअा उपर की अौर जाने लगा। मैंने अपना हाथ थोडा उसके पीछे की अोर लगाया अौर उस के कूल्हे पर रख दिया। मेरा अपनी वासना पे काबू न था अौर मेरा हाथ अब हवस के मारे थर थर कांप रहा था लेकिन श्रेया अब भी चुपचाप लेटी हुई थी। मैं ने अपने हाथ को उसके कूल्हे पर फिराना शुरु कर दिया। थोडी देर में मेरा हाथ उसके कूल्हे के गिर्द था अौर हौले हौले दबाने लगा। मेरा अंगूठा उसके कूल्हे पर अौर अन्गुलियां उसकी  गाण्ड के बीच की दरार तक पहुंच गयी थी। गाण्ड के बीच में एकदम कोमल कोमल अनुभुति हुई अौर लौडा उठक बैठक करने लगा। मैंने श्रेया की पेंटी नीचे सरका दी अौर हाथ अन्दर डाल के श्रेया की नंगी गाण्ड को दबोच लिया। मैं कोई ५-१० मिन्ट यूंही श्रेया की गाण्ड मसलता रहा, फिर मैंने अपना हाथ थोडा अौर अन्दर डाल के अपनी बीच वाली अन्गुली से उसकी चूत की दरार को छू लिया। एकदम गरम गरम अौर गीली चूत पे मेरी अन्गुली फिसल सी गयी। श्रेया को मानो करंट सा लगा अौर एकदम उठ के बैठ गयी। मेरा हाथ एकदम बाहर अा गया अौर मैं एकदम चोर की तरह चौंक कर पीछे हो गया। मेरी पेंट मेरे घुटनों तक अा गिरी अौर मेरे बोक्सर में मेरा तना हुअा लन्ड साफ दीख रहा था। श्रेया बोली – “क्या कर रहे हो?”। मुझ से कुछ जवाब न बना, शायद थोडी गिडगिडाहट मुंह से निकली कि गलती हो गयी, मैडम को न बताना। श्रेया बोली-ठीक है, लेकिन मैं जैसे बोलूं वैसे ही करना। मुझे तुरन्त समझ नहीं अाया कि मेरी किस्मत खुलने वाली है। श्रेया थोडी माया की अौर सरकी, लेट गयी अौर मुझे अपने पास लेटने को बोला। मैं बिस्तर पे लेट गया, अब बिस्तर के एक सिरे से दूसरी अौर सोती हुई माया, श्रेया अौर मैं लेटे थे। श्रेया ने मुझे अपनी पेंट उतारने को कहा। मुझे बस ये डर लग रहा था कि माया न जाग जाये अौर रंग में भंग न पड जाये। मैंने अपनी पेंट अौर कच्छा उतार दिया, श्रेया ने मेरी टी-शर्ट भी उतार डाली। पूर्ण रुपेण अनाव्रित्त होने से लौडा हिचकियां सी भरने लगा। मैं श्रेया के साथ लेट गया। श्रेया ने मेरा लन्ड थाम लिया अौर अपने हाथ से मुट्ठियाने लगी। मैंने अाह भरी अौर अपने मन की कामना पूरी कर ही डाली अौर उसके मम्मों को कस के भींच डाला। कमसिन अौर नाजुक पतली कमर के बावजूद मौटे मौटे मम्मे मेरे हाथों में भर भी न पा रहे थे। मैं ने उसके तमाम कपडे उतार फेंके। माया के साथ सो रहे होने की सोच से लौडे की तडप अौर बढी जा रही थी। मैं अौर श्रेया दोनों एक दूसरे के चेहरे को चूमने चाटने लगे, पहले प्यार से फिर थोडे ज़ोर से। चूचे इतने मजेदार थे कि छोडने को जी नहीं चाह रहा था, अौर थे भी इतने दमदार कि मेरे जोरों से दबाने पर भी अन्दर से सख्त सख्त प्रतीत हो रहे थे। उसके निप्पल पानी भरे गुब्बारों के अगले भाग की तरह बिल्कुल नर्म नर्म थे। मैंने निप्पलों को च्यूंटी में भरा अौर अपना मुंह लगा के उसका यौवन रस चूसने लगा। श्रेया कराहें मारने लगी अौर मेरे बाल जोरों से खींचने लगी। उसे मुझसे अौर सख्ती चाहिये थी। मैंने उसे निराश नहीं किया अौर अपने होठों अौर हल्के हल्के दांतों से उसके मम्मों को हौले हौले चबाने लगा, कभी यहां कभी वहां। सबसे मजेदार था, मम्मों के निचली अौर पसलियो वाला हिस्सा। चूमने अौर चूसने में नर्म अौर उसके मस्त रसभरे गुंदाज मम्मे मेरे चेहरे पर रगडते जा रहे थे। मेरा एक हाथ उसके एक कूल्हे को जोरों से भींच रहा था। फिर मेरी बीच वाली अंगुली फिसल कर उसकी गीली चूत में जा घुसी। श्रेया अपने कूल्हे अागे पीछे करके मेरी अन्गुली को चौदने लगी। 

 

मैने मुंह उसके मम्मों से हटाया अौर उसके अधखुले होठों को चूसने लगा। मेरी जीभ उसकी जीभ से लिपटी जा रही थी। अब चौदने का वक़्त अा चुका था। मैंने श्रेया से कहा कि कंडॉम लेने बाहर जाना पडेगा, वो मुस्कुरायी अौर उसने अपने पर्स से एक कंडॉम का पैकेट निकाल के मेरे हाथ में थमा दिया। मैंने सोचा कि हिन्दुस्तान कितना बदल गया, हालांकि शिकायत कोई नहीं। मैं पैकेट फाडने लगा तो वो बोली – एक मिन्ट, अांख मारी अौर माया की अौर पलट गयी। मुझे समझ में नहीं अाया, लेकिन अब तक जो हो रहा था अच्छा ही हो रहा था। मैं ने उसके पीछे से कन्धे के उपर से मुंह निकाल के उसके चेहरे को चूमना शुरू कर दिया। मेरे हाथ अब पीछे से उसके मम्मों को दबोच रहे थे। मेरी जांघे उसकी गदरायी गांड से सटी थी अौर लन्ड उसकी टांगो के बीच से निकल कर उसकी गीली चूत से रगडे खा रहा था। मैं ये सब कर रहा था अौर मेरे सामने लेटी श्रेया अपने हाथ से माया, जो कि श्रेया की अौर मुंह करके लेटी थी, के कंधे को सहलाने लगी। मेरा माथा सा ठनका, लेकिन सोचा कि मैं तो इनके लिये नया हूं, ये तो एक दूसरे को जानती हैं, सो देखते हैं अागे क्या होता है। सोच सोच के ही लंड से अांसू से निकल कर गीला कर गये। श्रेया ने मुंह पीछे करके शरारत भरी मुस्कुराहट से अपने मुंह के सामने तर्जनी लगा कर चुप रहने का इशारा किया। मैं कौन सा शोर मचा कर रंग में भंग करने वाला था। श्रेया ने माया का गाउन सामने से खोल दिया। माया ने बहुत ही सेक्सी चमकते काले रंग की ब्रा पहन रखी थी। मैं चुपचाप श्रेया के मम्मों का दमन करते हुए चूत से लन्ड रगडता रहा। मैं थोडा उपर होके जरा ठीक से लेटा तो मेरा खडा लंड भी उपर अाके उसकी गांड की लकीर के साथ नीचे की अौर मुडे मुडे सट गया। मैंने अपनी अंगुलियां अौर भी जोरों से उसके मम्मों में गडा दी। अब श्रेया हौले हौले माया के मम्मों को उपर उपर से दबा रही थी। रात की हल्की रोशनी में काली ब्रा के अन्दर कसे माया के मम्मे दूधिया नजर अा रहे थे। मेरा दिल बैठ सा गया। एक एक पल इतना अानन्ददायी था कि मुझसे झेला भी न जा रहा था। मैंने अपने एक हाथ को श्रेया के मम्मे से हटाया अौर उसके पतले अौर नाजुक पेट पर फिराते हुए उसकी चूत तक ले गया। श्रेया ने एक बार फिर मुड कर मेरी अोर एक अौर मुस्कान रुपी जलवा फेंका। मैं अपने हाथ से उसकी चूत रगडते हुए नीचे की अौर ले गया अौर तब रुका जब मेरा हाथ चूत के दरवाजे पर दस्तक देते हुए मेरे लंड से टकराया। 

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